पोस्ट बॉक्स
क्षितिज से लटके किसी लालटेन के सहारे रात गुजारते सितारों से पूछने पे रौशनी का पता मिलेगा, पर किसी की आस में बैठे को उसके इंतजार का हक अदा हो जाये ये शायद इस दुनिया के हिसाब में नहीं है... किसी हिसाब से उसका खत भी लालटेन ही रहा होगा जिसकी रौशनी में मोहब्बत के सितारे ढूंढने निकला था। ... कलकत्ता के किसी तंग सी गली के सहारे लगे पोस्ट बॉक्स से कॉलेज से लौटते मुझे उसके खत मिला करते और इस उठते धुएं के आग को अपनी चिंगारी वही से मिली। खतों को पोस्ट बॉक्स के अन्दर डालने वाले पारम्परिक रिवाज को ताक पे रख हम खत उसके उपर रखा करते... आखिर हमें डाकिये की जरुरत जो ना थी। युनिवर्सिटी को लगते आखिरी मोड़ के पास की टपरी पे बैठा मैं गीली सड़क को धुएं के बीच से देखता हुआ उसका इंतजार करता। ट्रैम टैक्सी और बसों के शोर के बीच कलकत्ता कुछ शांत सा लगता था। सीधी चोटी में रिबन लगाये वो चिट्ठी रखने के बाद एकबारगी मुझे देखती और फिर अपने गर्ल्स कॉलेज में चली जाती। मैं अपने सिगरेट की आखिरी कश खींचता उस पोस्ट बॉक्स की ओर बढ़ जाता... इस चिंगारी को कुछ तीन महीने हो चुके थे। युनिवर्सिटी के मेरिट लिस्ट देखने आया मैं, जब उसे ...