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कुत्तों का शत्रु

 एक सुबह आयी  उसकी मौत की खबर  अखबार के साथ  एक पल को झिझका  दूजे पल अखबार को भींचे  बढ़ा उसके आजीवन निर्द्वन्द रहे आवास की ओर  जहाँ सोते थे कई सितारे उसके साथ  और चाँद दिया करता था पहरा सारी रात।  वहाँ पहुँचने पे देखा  एक मैं ही नहीं था संवेदना से लिप्त  कई और भी थे जिन्हें काम से फ़ुरसत थी।  पता चला  पेट कई दिनों से खाली था  शायद पीठ से मिलने  पीछे जा चुका था  तलवे सूखी धरती के प्रतिबिम्ब जान पड़ते थे  लकीरों ने अजीब आकृतियाँ बना रखी थी हर ओर  इसी बीच ठंडी हवाओं के थपेड़ों ने अपनी चाल चली और काली स्याह रात में गली के कुत्तों ने खो दिया  अपना सबसे बड़ा शत्रु। 

टूटते सितारे

 क्षितिज पर टूटते सितारें को फिर से किसी पन्ने के बीच दबाने को बेचैन, जैसे एक मुट्ठी भर आसमान का हिस्सा ले लेना चाहता हो… तुम्हारी याद आते ही अजीब से सवालों और खयालों से मन पगला सा जाता है! बेजान होती चिट्ठियों में तुम्हारे बारे लिखी कुछ लाइनें शोर करती है जैसे सूखती कोई नदी से दूर भागते हंस… किसी गुलाब की बेजान होती खुशबू जो कभी बेकश अपनी ओर खिंचती थी, तो किसी पन्ने पर उकेरी गई कुछ लाइनें जो कविता बनने की उम्मीद में दम तोड़ बैठी… अब ऐसा अक्सर तो नहीं होता मगर कभी कोई दो चार रोज भी ऐसे नहीं जाते जिनमें कभी एक पहर को तुम्हारी याद ने रेगिस्तान में उठती लहर से मुझे काबू ना कर लिया हो! खैर अबके ना आना, अब चले जाना ही बेहतर है… मगर वो कैसे जाये जो हमेशा यही कही आपके पास बैठा होता है? तुम यही कही होती हो… कही किसी कोने में मेरे भीतर… मेरी जिंदगी का कोई हिस्सा नहीं जिसे तुमने छुआ ना हो… इस किनारे की हर रेत तुम्हारे हाथों से होके फिसली है, इस समंदर का हर मोती तुमने बनाया है… :(

अंजान हथेलियां!

 दो खत भेजने के बीच कितना वक्त होना चाहिए? शायद उतना जितना खतों को लिखने में लगे... और फिर खतों को लिखने में वक्त लगता भी तो है। दो मेसेज के बीच कितना वक्त होता है? शायद कुछ सेकेंड या कुछ मिनट कभी... खतों में एक अरसा बीत जाता है! और फिर खतों में सब कुछ लिखा होता है। पिछले खत से अब तक हुई सारी बातें, पिछले खत का जवाब, दिल में उठती कहानियाँ, मन में उठते सवाल और सबसे जरुरी लौटती डाक से जवाब भेजने की लाईन, "जवाब लिखना... इंतजार रहेगा..." दो सितारों के बीच कितना फासला होता है? शायद एक हथेली से भर जाये उतना... और अगर एक हथेली से ना हो तो दुसरी खोज लो... दो अंजान हथेलियां किसी भी फासले को भर देती है... खतों की अपनी दुनिया होती है जहाँ उनके अपने किस्से, कहानियाँ, जिन्दगी होती है। देखा है कभी दो खतों का प्यार? दो खतों के बीच जो वक्त होता है उसमें दो लोग ही बेचैन नहीं होते दो कागज के टुकड़े भी बेचैन होते हैं या शायद होते थे... एक पच्चीस पैसे का टिकट लगा लिफाफा जाने कितने ही अनमोल खयालों को ले जाता था...दिन, दो दिन, या सप्ताह? दूर पास के कितने ही खतो...

मार्तण्ड

मृगशिरा की चांदनी थी। तेज गिर रहे जलप्रपात से उठते धुन्ध ने ब्रह्म मुहूर्त की वेला को मानो स्वर्गातीत कर दिया था। जंगल के बीच बनी कुटिया में रह रहे उस योद्धा ने बाहर निकल जलप्रपात को नीचे से ऊपर तक निहारा। वरुण देव के समक्ष नतमस्तक उस शूरवीर ने पूर्ण समर्पण के भाव से नमस्कार किया और उस पर्वत के नीचे बने उस जलाशय में उतर गए। रोज का यही नियम था। वर्षों के रक्तरंजित के उपरांत इस निर्जन वन में उस शौर्यवान तलवार का प्रयोग शायद ही पुनः कभी हुआ हो। अब तो ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक जल में निमग्न महादेव की उपासना का कार्यक्रम ही सतत चलता था। अपने राज्य की माता गङ्गा को स्मरण करते वीर ने बाहर कदम रखे। छाती को चीरती एक लंबी सी लकीर मानो गर्व से चित्कार कर कह रही थी, "ये गौरव गाथा है मेरे जीवन की, एक क्षत्रिय की!" नदी से बाहर कदम पड़े ही थे कि पीछे वट के पेड़ में छिपा बैठा सिंह उस निहत्थे पर कूद पड़ा। एक प्रहार और पंजे पीठ में धंसते चले गए। दाहिने हाथ को जमीन पर टिकाते उसने अपना संतुलन बनाया। रक्त की एक धार सीधे सिंह के मुँह जा लगी थी। उसका पीले घास सा चेहरा गाढ़ा लाल दिख रहा था। योद्...

अल्का. ❤

इतने दिन बाद गाँव जा रहा था कि गाँव के रास्ते भी अब मुझे देख पूछते से लग रहे थे "कहाँ थे बऊआ इतने दिन?" खैर हम भी ढ़ीठ सो तिस पर भी मुँह उठाये बढ़े जा रहे थे।  पर इतने साल बाद अब गाँव की सड़क पहचान में नहीं आ रही थी! खेत भी बदल से गये थे। बढ़ती पीढियों ने खेत बाँट दिए थे। गाँव के बाहर ही हम जीप से उतर गए, सुबह की हवा बहुत दिनों बाद मुँहजोरी कर रही थी! आम बौरा रहे थे, और बांस की कटाई हो रही थी। ढलाई वाली सड़के चिढ़ा रही थी "क्यों जब छोड़ गये थे तब गढ्ढे थे ना इधर?" सब बदल सा गया था पर गाँव कि वो सुगंध बरकरार थी। अभी गाँव का बॉर्डर क्रॉस ही किया था कि "अरे गट्टू? कैसे हो?" ने एकदम से जैसे 6 साल पीछे खींच लिया। "ठीक है चचा, आप?" "अरे हमको का होगा लला। सब महादेव की दया है।" "औ चाची?" "चाची एकदम ठीक है बस ई सोनुवा बऊरा गया है आजकल।" "का हुआ चचा" "अरे पढ़ता ही न है बुड़बक" "हहा अरे लड़का है अभी चचा सीख जायेगा" "हाँ लला चलो बागान में मट्ठा भेजी है आज चाची तुम्हारी पी के घर जाना" ...

पोस्ट बॉक्स

क्षितिज से लटके किसी लालटेन के सहारे रात गुजारते सितारों से पूछने पे रौशनी का पता मिलेगा, पर किसी की आस में बैठे को उसके इंतजार का हक अदा हो जाये ये शायद इस दुनिया के हिसाब में नहीं है... किसी हिसाब से उसका खत भी लालटेन ही रहा होगा जिसकी रौशनी में मोहब्बत के सितारे ढूंढने निकला था। ... कलकत्ता के किसी तंग सी गली के सहारे लगे पोस्ट बॉक्स से कॉलेज से लौटते मुझे उसके खत मिला करते और इस उठते धुएं के आग को अपनी चिंगारी वही से मिली। खतों को पोस्ट बॉक्स के अन्दर डालने वाले पारम्परिक रिवाज को ताक पे रख हम खत उसके उपर रखा करते... आखिर हमें डाकिये की जरुरत जो ना थी। युनिवर्सिटी को लगते आखिरी मोड़ के पास की टपरी पे बैठा मैं गीली सड़क को धुएं के बीच से देखता हुआ उसका इंतजार करता। ट्रैम टैक्सी और बसों के शोर के बीच कलकत्ता कुछ शांत सा लगता था। सीधी चोटी में रिबन लगाये वो चिट्ठी रखने के बाद एकबारगी मुझे देखती और फिर अपने गर्ल्स कॉलेज में चली जाती। मैं अपने सिगरेट की आखिरी कश खींचता उस पोस्ट बॉक्स की ओर बढ़ जाता... इस चिंगारी को कुछ तीन महीने हो चुके थे। युनिवर्सिटी के मेरिट लिस्ट देखने आया मैं, जब उसे ...

तस्वीर और कविताएँ

लड़का लिखता था... लड़की तस्वीरें बनाती थी... दोनों के सपने उन तस्वीरों में रंग भरा करते थे... तस्वीरों में कविताएँ उकेरी होती, तो कहानियों में रंग भरे होते... तितलियाँ उड़ती तो उन संग उनको बुलाती उनके पीछे भागती लड़की का गीत लिखा जाता, चिड़ीयों की तस्वीर बनती तो उनकी कूक पर कविताएँ लिखी जाती... आसमान जब जब रंग बदलता उसे एक खत लिखा जाता... सितारे उकेरे जाते तो उनके टूटने पे कविताएँ होती... जब बरसात होती तो खिड़की पे आवाज करती बारिश की बूँदों जैसी कविताएँ लड़के की डायरी में मिलती... कई बार ऐसा होता लड़की लड़के की तस्वीर बनाती... तो लड़का लड़की पे कविताएँ लिखा करता... लड़का प्रेम पे कविताएँ लिखता तो लड़की दोनों की तस्वीर बना दिया करती... तस्वीर बनते गए, कविताएँ लिखी जाती रही... प्रेम की जड़ गहरी होती रही... जब उस की तस्वीर बनाया करता था कमरा रंगों से भर जाया करता था। पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था। थक जाता था बादल साया करते करते और फिर मैं बादल पे साया करता था। ~हाफ़ी💙 कविताएँ रह गई, तस्वीर रह गये!