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Showing posts from October, 2020

पीला गुलाब

  स्याह रातों की ओर ढ़लता हुआ सूरज एक बेमेल शाम से कह रहा था “क्या हुआ तुझे? आज इतनी मद्धम क्यों है?” शाम जैसे उदास सी थी। हल्की हल्की सरसराहट से पत्ते बार बार झूम उठते थे। घर को लौट रही चिड़ियों की टोली हल्की हल्की आवाजें निकाल शांती को पल भर के लिए तोड़ देती। पर इन सब के होते एक उदासी सी आसमान में फैली हुई थी। एक ऐसी उदासी जो इन सब से परे थी, एक उदासी जो शाम से कही ज्यादा मेरे मन में थी! लाल से गुलाबी होते होते कैसे आसमान ने मन में उदासीनता के बादल ला दिये पता ना चला। खत तो एक बार फिर लौट आया था। पर पता तो यही दिया था, फिर? कोई बात नहीं शायद काम से कही गये होंगे। और यादों ने खींच कर पीछे कर दिया। पाँच खत और दो साल पीछे। और खत में था भी क्या? “अमित, ठीक तो हो? हर वक्त ये फिक्र रहती है की तुम कैसे हो मगर सिसकियाँ रोक लेती है उस सवाल को हर बार।इस बार शायद खत मिल जायेगा तुम्हें तो जवाब लिख भेजना। लिख भेजना तुम क्यों गये! तुम्हें पीला गुलाब जो दिया था, हो सके तो उसकी एक पंखुडी भेज देना! तुम्हारी सुरभि!” अमित को गये दो साल हो गये थे। इन दो सालों में अगर सुरभि को कुछ मिला तो वो था अमित ...

रूई के फाहे…

  वो भाग रहा था, हालांकि ये जानते हुए की भागना हल नहीं होता, फिर भी ये उस वक्त आसान लगता है!भाग जाना सब से दूर, शोर कोलाहल से दूर, रिश्तों पुकारों से दूर, खुद से दूर … भागते भागते हम कही और निकल जाते हैं मसूरी, वो मसूरी निकल गया। क्यों, ना मालूम! सफेद चादर से ढ़की पहाड़ियाँ, मखमली हरी घास, रंग बिरंगे पंछी, नीले आसमान पर पेन्टिंग करते सफेद रूई के फाहे और टेढे मेढे रास्ते। सब जैसे भाग जाने के लिये ही बनाया गया था! इस पूरे भागने के दौरान हम एक चीज छोड़ जाते है, हम भाग किससे रहे है? वो किससे भाग रहा था? अपने अतीत से, एक शख्स से जो उससे दूर होकर भी हर वक्त उसके साथ होता था पर अब वो उसे बोझ लगने लगा था। अपनी गलतियों से जो उसे इस रास्ते पर लाई थी। पर क्या भाग जाना आसान होता है? रास्ते में पड़ने वाली “कशिश चाय स्टौल” उसे वापस वही ले गई जहाँ से वो भाग कर आ रहा था, कशिश… रास्ते के किनारें लगे गुलमोहर के पेड़ों से गिरे गुलमोहर को चुनती लडकियों ने उसे वापस अपने शहर में गुलमोहर चुनती “उसके” पास भेज दिया जो अब उसके दिल के किन्ही दूर के गलियारों में सिमट गई थी… पर ये सिमटन बड़ी अजीब होती है, जरा ...

PENANCE : Part 1

  A man, his daughter and the moonlight.For all the failures that encompassed his life, for all the relations he miserably failed at, for all the places his emotions dragged him into he chose… He chose a PENANCE, over all that he could do.A girl, yeah a girl it would be. A girl who can get the wings he shed.A girl who can look into his eyes and say, “You did it dad, you did it!” Penance, and why so… PENANCE,for what he did in his life that always had hurt him was betraying a girl he loved. Penance, for what he had always done in his life was being dominated by anger. Penance, for what he had done in his life was never repay the love back the love to his mother that she deserved. Penance it was… But will he? Will he be able to hold that fine thread, that makes the most subtle of relations in the world, a father and his daughter… Penance, yeah it was…🍃~PENANCE

प्रेम की नाव!

  तालाब के किनारे बैठ किताब पकड़े कोई प्रेम पढ़ रहा था, तो दूसरे हिस्से से उसे निहारते कोई प्रेम गढ़ रहा था।प्रेम का पढ़ा जाना और गढ़ा जाना समानांतर क्रिया हो गई। कोई पन्नों में प्रेम पढ़ रहा था, तो कोई उन पढ़ती आँखों से प्रेम गढ़ रहा था। तालाब में उसकी कांपती परछाई बता रही थी की वो प्रेम गढ़ रहा था। प्रेम करने वाले का हृदय तेज धड़कने लगता है। पर कुछ गढ़ने के लिये पहले उस चीज को अपनाना होता है। यहाँ तो जिससे प्रेम की डोर बाँधनी है उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। देर तलक बैठ प्रेम को प्रेम पढ़ते निहारना भी एक तपस्या ही है। आप होते उसके पास ही है पर दूर होते है।कैसी परिस्थिती है! इन सब के दौरान सोच विचार जारी रहती है, प्रेम जारी रहता है और डोर बाँधने की इच्छा भी! पर किताबों के सफेद पन्नों पे काली काली उन बेजान शब्दों के प्रेम को हम जितनी आसानी से समझ जाते हैं क्या सामने वाले के…खैर ना समझे, प्रेम खतम थोड़े न हो जायेगा! इस हिस्से में एक कॉपी थी, इसपे प्रेम लिखा जा सकता था सो लिखा गया। एक नाव बना कर प्रेम से प्रेम को प्रेम तक प्रेसित किया गया। हिमाकत थी ये मगर प्रेम ढ़ीठ बना ...

नज़्म

  जब रोज शाम डूब रहा सूरज तुझसे विदा लेने आता और तू पाँच और मिनट मांग उसे बड़े सलीके से रोक लिया करती थी, जब मेरे होठ हर बेमुक्कमल साँस को पुरा करने को तेरी पेशानी को चूमने निकल पड़ते थे, जब हर अरदास को उठे मेरे हाथ मेरे लबों को छू खुदा से तुझे मांगने की जुस्तजू करते थे, और बेमुरव्वत रातों को तेरी बेतरतीबी से बिखरी जुल्फों (जो किन्हीं वजहों से बार बार तेरी होठों को छूने आती थी) की कहानियाँ सुनाया करता था, जब शांत पड़े उस गहरे झील का पानी भी मेरी सांसो के चलने की आहट सुनने खुद को समेट लिया करता था, जब मेरी आँखें हर रात एक ही ख्वाब पर जा कर अटक जाया करती थी, तब भी मैं खुद को इतना खुशनसीब ना मानता था की तू मेरे साथ है, मगर आज आज जब की वक़्त और हालात अलग तस्वीर बयाँ करते है, जब मेरी सांसे कहीं अंदर ही अटक जाती हैं, जब झील मेरी खामोशी सुन शांत नहीं रह जाती,   जब रात को तेरी कहानियाँ सुनाने पे तारे टूटने लगते है, और हाथ अब दुआ को उपर नहीं जाते, अब मैं खुश किस्मत हूँ, मैं खुश किस्मत हूँ की मैं हर वक़्त जहन में तेरी तस्वीर लिए बैठा हूँ!

दिल मिलते हैं…

  “आप बड़े दूर के लगते हो साहब, गाँव में काहे आये हो?” कई बार स्मृतियाँ यूँ ही आ जाती है, और जैसे ठंडी हवा का झोंका खिड़की की हल्की सी पोर से अंदर आ पूरे कमरे को भर देता है, वैसे ही यादें पूरे मन को भर देती है झंझावातों से! दूर हिमाचल की पहाड़ियों में छुट्टियाँ मनाने की ये यादें बस कुछ पहाड़ों और झीलों तक सिमट जाती मगर उसके कारण आज भी वो याद आते ही मन में “ओ मेरी ओ मेरी ओ मेरी शर्मिली” बजने लगता है और मैं शशी कपूर की तरह नाचने लगता हूँ! वो लम्बी चिकोटी नाक, लाल गाल, मद्धिम गुलाबी होठ और पतली सी चोटी में गुथे बाल! हिमाचल में जब उसके गाँव पहुँचा तो वहाँ ट्यूलिप के फूलों की क्यारीयों के बीच से वो जो निकली तो लगा मानो गा ही दूँ “खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को!” वो रात पूरी उस चेहरे को ट्यूलिप के क्यारियों से निकलते देखने में ही बीत गई। छोटे से ढाबे में लाईन से लगे बिस्तर पे कई तरह के लोग लेटे थे और बैकग्राउंड में “रात कली एक ख्वाब में आई बज रहा था!” हम सोचे कल सुबह उसे कैसे भी कर गाँव में ढूंढेंगे और बस कह ही देंगे “रुप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना!” पर भरे गाँव से पिटने के ड़र ...

प्रेम की चाय

  डाइनिंग रुम साफ करते करते श्रीमती जी ने एक बार और आवाज लगाई। “चाय मिलेगी?” “बस आया रेणु!” “क्या सोचने लग जाते हो चाय चढ़ा कर?” “कुछ नहीं बस यूँ ही” “तुमने तो जैसे चाय उबालते हुए किसी नये दार्शनिक सिद्धांत को खोजने का मन बना लिया है। कैसे खोये रहते हो” “हाहा” “ये लो चाय” “बैठो न” उम्र की ढलान पे काफी आगे निकल आये दोनो शादी के 40 साल बिता चुके रमा बाबू 65 के थे और रेणु 58 की। “जरा गाना लगाओ अब तो ये न्यूज देखने का जी नहीं करता” “हूँ। रवि से बात हुई?” “सुबह कॉल किया था आपके लाल ने। ठीक है वहाँ!” “हूँ” हम दोनो दो प्रेमी.. गाना बज उठा! “क्यूँ मुस्कुरा रहे हो इतना?” “ये गाना याद है तुम्हे?” चाय की सी रंगत उसके चेहरे पे फैल गई। इस उम्र में भी शर्म से झुक रही उसकी आँखे छुपाए गये असीम प्रेम की झलकियों को दिखा रही थी, वो जो अक्सर ढ़लती उम्र के साथ इस जीवन यात्रा में गाड़ी में कही पीछे बैठ जाता है जिम्मेदारी आगे। “याद कैसे ना होगा” “रेणु उन दिनों की बड़ी याद आती है” “शादी की अगली सुबह ही तुम यहाँ आये थे नौकरी को और ट्रेन में खिड़की पे सामने सामने बैठ तुमने ये गाना गाया था। फिर गाओ ना!” रमा ...

जब मौत आये

  मैं चाहता हूँ जब मौत आये अचानक न आये, मुझे थोड़ा थोड़ा आभास हो कि वो आ रही है। अनायास नहीं, एकबारगी नहीं, जैसे नींद आती है धीरे धीरे वैसे! पता होता है नींद आ रही है पर एक अलग सुख होता है। जब धीमे धीमे मृत्यु मेरी ओर बढ़ रही होगी मैं खुश होउँगा! सुना है मरने के पहले सारी जिन्दगी किसी शार्ट फिल्म कि तरह आँखों के सामने घूम जाती है, मैं चाहता हूँ मैं इसे इतने कम वक़्त में ना देखूँ। मैं पूरी जिन्दगी आराम से देखना चाहता हूँ, सब घटते हुए, सुखों को थोड़ा फास्ट फॉरवर्ड किया जा सकता है पर दुख मुझे स्लो मोशन में देखने है! मैं अपनी गलतियाँ देखना चाहता हूँ, अपने डर देखना चाहता हूँ। मैं छत के कोनो पे खड़े होने से डरता हूँ मैं खुद को वही देखना चाहता हूँ अपने सबसे आखिरी पल में! मैं चाहता हूँ जब मैं अन्तिम साँस लू मैं उस कोने से गिर जाऊँ और जमीन छूने के ठीक पहले मुझे गोद में उठा लिया जाये! मैं हवा के उन थपेड़ों को साँसों में ही महसूस कर लेना चाहता हूँ। जब मैं मर जाऊँ मेरी अस्थियाँ मेरी गाँव के उस बागान में बिखेरी जाये जहाँ मेरे दादा दादी को मैंने मिट्टी में मिलते देखा है! कुछ राख उस पावन गंगा में...

“जानते हो मैं कब मरा था?”

  करीब 16 साल से हम गया में रहा रहे है। वही गया जहाँ पिण्डदान होता है। जहाँ पितृपक्ष मेला लगता है।भगवान विष्णु की स्थली गया तारण भूमि है। रानी अहिल्याबाई द्वारा बनवाया गया मंदिर बड़ा भव्य और सुन्दर है। नदी के किनारे होने के कारण अक्सर आते जाते रहने थे हम।एक बार की बात है हम शाम करीब 6 बजे मंदिर गये। ठंड के दिन थे सो अन्धेरा हो गया था। घर पे कोई नहीं था सो हम निठल्ले बने घूम रहे थे। फिर ऐसे में का ठंड और का हवा। बड़ी देर मंदिर में बैठे रहे।जवान खून और माँ पापा नया नया अकेले छोड़ के गाँव गये थे सो हम खूब जोश में थे। मंदिर के कपाट समय पर बंद हो गये तो हमें बाहर निकलना पड़ा। मंदिर से लगे नदी तट पे शमशान घाट है। मणिकर्णिका की तरह यहाँ भी अनवरत चिता जलती रहती है।काली रात में दूज के चांद के मद्धम रौशनी में सीना ताने हम घाट की ओर चल दिये। अभी बस हम उधर बढ़ ही रहे थे की “राम नाम सत्य है” की अनवरत गूँज सुनाई दी। हम हाथ जोड़ के खड़े हो गये।लाल साड़ी में पूरी श्रिंगार किये एक 40-45 साल की औरत की लाश अर्थी पे रखी थी। आगे में कंधा दिये एक लड़का लगातार रोए जा रहा था। शायद उसका लड़का था। एक बार को...

राजे

  बचपन में गर्मी की छुट्टियों में जब गाँव जाया करता था तो अक्सर शाम को अखाड़े जाया करता था। एक तो सबको मुद्गर उठाते और कुश्ती करते देख मन ना भरता दूसरा उस वक्त अखाड़े में हर शाम बच्चों को महान लोगों को कहानियाँ सुनाई जाती थी। कहानियाँ उन वीरों, ज्ञानियों और सन्तो की जिन्होने भारत को ढाला और वो बनाया जो भारत आज है। जिन्होंने भारत को बचाए रखा झुकने न दिया।जाने ये अखाड़े का असर था, या वीरता का या कुछ और वीरों की कहानियाँ मुझे हमेशा से आकर्षित करती। समुद्रगुप्त, पुष्यमित्र, शिवाजी और महराणा के बारे में पढ़ नसें फड़कने लगती। तब लगता अगर मौका मिले तो मैं भी ”राजे” सी वीरता दिखलाऊँ!वक्त बीता और मैं शहर आ गया। यादें पहले धुन्धली हुई और फिर खो गई। वीरता की कहानियाँ सुनाने वाला अब कोई नहीं था ना ही कोई ये बताने वाला की जो पढ़ा जा रहा हूँ सब सच से कोसों दूर है।खैर धीरे धीरे खुद से पढ़ना और जानना शुरु किया तो जो यादें कही धुल खा रही थी उन्हें अलमारी से निकलने का मौका मिला। इसी दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज जी एक जीवनी हाथ लगी। जब पढ़ने लगा तो बचपन की कहानियाँ सब याद हो आने लगी।कैसे अखाड़े में का...

एक डरावनी कहानी

  तो बात कुछ तीन साल पहले की है। हम गाँव जा रहे थे सुबह के तीन बजे। घुप्प अन्धेरा था और सड़क खाली होने के कारण बाइक थोड़ी तेज ही थी। शहर में हमारा मकान है और गाँव हमारा करीब 30 किलोमीटर अंदर। हम शहर छोड़ बस निकले ही थे की बाहर में एक खाली मकान में से बच्चा झांकता दिखा। गाँव आते जाते रहने के कारण हमको मालूम था की उस घर में कोई रहता नहीं है। एकबारगी तो हमारा कलेजा धक्क कर गया पर हम बस उठ के गाँव ही चल दिये थे सो हमको लगा हमको नींद में भ्रम हो रहा है। हम आराम से गाड़ी चलाने लगे। उस बच्चे का चेहरा एकदम सामने घूम रहा था और जाने क्यों मन हो रहा था की वापस घूम के उसको देख आये। जब बहुत ज्यादा बेचैन हुए तो हम गाड़ी घूमा दिये। वापस वहाँ पहुँच के हम जब गाड़ी का फ्लैश लाईट जलाए तो सुन्न रह गये। कुछ देर पहले जिस खिड़की पे हम बच्चे को लटके देखे थे ऊ बंद थी। धकधक करता दिल ले हम तुरंत बाइक मोड़ लिये। इस बार हमको यकिन हो गया था की हम नींद में सपना देखे थे सो एकदम धीरे गाड़ी चलाने लगे ताकि कहीं झपकी लगे तो बचने की गुंजाइश हो। धीरे धीरे बढ़ते हम दो गाँव पार किये। पर एक अजीब सा शांती हमारा पिछा कर रहा...

यही है प्रेम!

  तुम हो या ना हो मुझे एक शख्स हमेशा तुम्हारे जैसा मिल जाता है… मेरे अंतर ने हर जगह जैसे तुम्हें जज्ब कर लिया हो! कितना संगीन अपराध किया, मैंने तुमसे बिना पुछे… जैसे आईना नहीं पूछता तस्वीर उतारने से पहले मैंने नहीं पुछा तुम्हें खुद में उतारने से पहले। बस तुम्हारा हो गया जैसे बरसों से इसी के लिये इन्तजार में था। जब आप प्रेम में होते है तो पूरी दुनिया में सबसे सुकून भरा उस शख्स का कन्धा होता है और आप शहर के ऐसे कोने तलाशते है जहाँ आपको आप उसकी गोद में सर रख सो पाये। सन्नाटे, एकान्त, अन्धेरे का सम्मान करना सिखाता है प्रेम… रवीश ने कहाँ था न आप शहर के हर अनजान कोने सम्मान करने लगते है। उन कोनों में जिन्दगी भर देते है… आप तभी शहर को एक नये सिरे से खोजते है जब प्रेम में होते है। हाँ वही एनडीटीवी वाले… मैं भी तो यही करता हूँ ना। तुम्हारी और मेरी खामोशियों के बीच कही दबी मोहब्बत को ढूंढ़ता हूँ। हमारे शहर में भी कहाँ है हाथ पकड़ने की जगहेंं मगर फिर भी तुम्हारे हाथों से छुआ जाना दिल चाहता तो है… और फिर इसके लिये जाने कितनी कोशिशें! तुम्हारे साथ आना जाना मेरा स्वार्थ है… जब बीच बीच में तुम ऑट...

माउथ ओर्गन

  बात है 1994 की। नया नया कॉलेज में एडमिशन हुआ था हमारा। ये मोड़ बहुत नया होता है सबके लिये, नये अनुभव नई कहानियाँ नये लोग। कुछ नये की तलाश में हम में से कई इस दुनिया में खो से जाते हैं।मैं पहली बार घर से दूर जा रहा था सो एक ड़र अपने साथ लिये जा रहा था। पर वो जो एक अलग सी फीलिंग होती है न की अब आगे क्या होगा वो हमारे साथ लगी थी। प्रयाग तब अलाहाबाद ही था। त्रिवेणी बाँह पसारे मानो कह रही थी “आओ लला तुम्हारी ललक थी!” अलाहाबाद यूनिवर्सिटी में कदम रखते ही वहाँ के कई कायदों से परिचय हो गया।सीनियर सब का भौकाल चलता था वहाँ। दबे सहमे हम दीवाल का साईड पकड़े सर झुकाये सारा फोरमेलिटि खतम किये औ वॉर्डन से बात कर के सब लईका लोग कमरा ले लिया। रात को दुबक के बैठे बकरों का शेरों ने जो स्वागत किया उसका वर्णन करना यहाँ संभव नहीं है। खैर ठेठ देहाती होने से हमको थोड़ा अपनापन जरुर मिला। धीरे धीरे समय बीता औ हम गंगा माँ की गोद में अपना समय बिताने लगे। इधर कही से टी वी पे सिनेमा गाना में राहुल रॉय आ शाहरुख सब को देख के माउथ ओर्गन का शौख चढ़ा। अब पैसा तो पहले से ही था नहीं औ बाबूजी से ई बोल के मांगते तो उल...

पलाश का रंग

  पलाश का रंग अब पहले जैसा नहीं लगता है मुझे। अब मुझे कुछ भी पहले जैसा नहीं लगता है। राजा पुल के नीचे बैठे साइकिल से तुमको स्कूल से लौटते देखने की आस में एकटक बैठने वाला लड़का अब इंतजार कराये जाने पे खीजने लगता है। वैसे इंतजार उसे कभी पसंद भी नहीं था, पर तुम्हारी बात और थी! मुझे याद है तुम्हारे घर में एक हरश्रिंगार का पेड़ हुआ करता था जिसकी आधी डालियाँ तुम्हारे घर की कील लगी दिवारों से बाहर झांकती थी। मुझे पसंद था हरश्रिंगार, फूल खुद ब खुद सुबह उस पे से झड़ जाया करते थे जैसे प्रेम से भरे इंसान से प्रेम झरता है। तुमसे अलग होना… तुमसे अलग होना मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी! मुझे सिर्फ तुमसे प्रेम था, या तुम्हारी साइकिल से, या फिर बस उस इन्तजार से जिसने मुझे शायद इंसान बना के रखा था! क्युंकि अब मैं इंसान नहीं हूँ, अब मुझसे इंतजार भी नहीं होता और ना ही अब मैं प्रेम करता हूँ। बड़े होते जा रहे शहर में बनते ये पुल जाने कितनी नई पनपती इश्क़ की कहानियों को अपने नीचे घटता हुआ देखेंगे! मैं इस बड़े पुल के नीचे कितने आसानी से छुप जाता हूँ, और तुम्हें इसे पार करने में लगने वाला वक़्त कित...

तस्वीर

  “पूरे चार घंटे छत्तिस मिनट लेट चल रही है। अब लगता है रात स्टेशन पे ही बितानी पड़ेगी।” “हूँ” “हूँ का? तुम तो बस एक नॉवेल पकड़ लो और सफ़र भर मुँह बंद कर के पड़े रहो।” “अरे तो का करना है बोल के? तुम्हारे बोलने से जे जल्दी पहुँच तो ना जायेगी।” “अरे सफ़र का मजा भी कोई चीज है।” “हाँ तो ले रहे है हम तुम चुप करो।” और राघव बाबू वापस से अपना मुँह नॉवेल में डाले पड़ गये। “अमा यार तुमसे तो कुछ बोलना ही बेकार है।” “हूँ” . चार घंटे बाद ट्रेन अपनी जोरदार होर्न बजाती स्टेशन में दाखिल हुई। “शुक्र है तुम्हारा नॉवेल खत्म हो गया था वरना हमे लगा था तुम उतरो ही न।” “अरे बस कर भाई अब क्या नॉवेल को ले के ही ताने मारता रहेगा।” “हाँ तो अब रात बिताने के लिए कुछ तो चाहिए न? पापा नाईट ड्यूटी के लिए ऑफिस में होंगे और घर होगा बंद। जा के करेंगे क्या?” “चलो वेटिंग रुम सो जाते है।” “तुम सो जाओ हम जगते है। वैसे भी दो घंटो में सुबह हो जायेगी।” सुबह चार बजे उठ दोनो घर के लिए निकले। “अरे पौने पाँच होने को आये है और पापा अभी तक ना आये है।” “आ जायेंगे। शिफ्ट चार बजे खत्म होती है न।” “लो आ ही गये… प्रणाम पापा।” “जीते रह...

पूरनमासी

  बरसाती पानी आज अलग ही शोर कर रहा था। मन जब कभी अशांत हो तो बारिश नहीं होनी चाहिए, बारिश उस अशांती को और बढ़ा देती है, याद… ये घर के बीच में आंगन का आइडिया शगुन का था। सुबह की पेहली किरण हो, शाम का ढलता सूरज, बारिश का पानी या पूरनमासी का चांद उसे सब से प्यार था! योगेश की जिन्दगी में जैसे पूरनमासी शगुन से ही आई थी। क्या होता है प्यार ये सवाल अगर कोई उससे पूछता तो शायद वो शगुन की तस्वीर दिखा देता। शगुन और उसका रिश्ता उन बहुत कम मोहब्बत की कहानियों में से है जो कॉलेज से शुरु होकर भी मुकम्मल हुए, शादी में तब्दील होकर! किस्मत किस्मत की बात। पर किस्मत अच्छे लोगों पे मेहरबान कहाँ होती है। सुख का छलावा हमेशा दुख के ढेर लिए मौके की टोह में बैठा होता है। शगुन की मौत ने योगेश को तोड़ दिया! पूरी जिन्दगी अकेलापन झेलने वाला इंसान भी बिखर गया। कभी कोई उसके साथ ना रहा था, माँ-बाप दोनों बचपन में ही छोड़ गये और अब ये… उसके बाद जाने कितने दिन ही उसने कमरे में बंद हो गुजारे। वो आंगन जाने कितने आसुओं का गवाह रहा होगा जो हर रात शगुन से की बातों को याद किये जाने दौरान बही थी। अपने को खो देने का गम अब सह...

दर्शन

  “अबे तुम आज भी किशोर कुमार लगा के बैठे हो! उधर भाभी भोलेनाथ के दर्शन को आई हैं।” “तो हम का करे? हम का उसके आगे पीछे घुमने का ठेका लिये हैं का? एक्को बार बोली हमको की आज मंदिर जायेगी? पूरे साल भर से घूम रहे हैं ऐसे आगे पीछे।” “ठीक है तुम ही बताओ ऊ इही मंदिर काहे आई बे?” “ऊ यहाँ इसलिए आई काहे की यहाँ घाट है। ज्यादा कहानी ना बनाओ बे चुप चाप गाना सुनने दो।” दरवाजा लगने की हल्की सी आहट के साथ गाने की आवाज ने फिर कमरे को भर दिया …रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई… “उसने तो कब्बो हमको ना पूछा। हम उसकी गली जाते है तो कहाँ घर से निकलती है।”… गाने के बंद होने से पहले ही जनाब कपड़े पहन बाल बना के तैयार हो चुके थे। “चलो यार… प्यार जो ना कराये!” घाट पे सूर्य देव को जल चढ़ाते उसे देख बेचारा सारा गुस्सा भुल गया! “कितनी खुबसूरत है यार ये।” धीरे धीरे बहते पानी पे पड़ती किरणें जब उन हवा के साथ खेलती झुमकों से टकराती तो लगता जैसे बस काश ये सब यही रुक जाता और वो इसी लम्हें में ठहर जाता! “इत्ती देर काहे लगा दी?…हाँ? बोलो अब। आज काहे नाक चढ़ाये हो?” “अरे नहीं कुछो नहीं।” “बोल भी दो।” “तुमको कै...

तुम

  छह महीने पहले जब तुमसे मिले तो देखते ही दिल दे बैठे। अब हमारा का कसूर था, तुम जो इतनी अच्छी हो फिर तुमसे प्यार क्यूँ न हो? और तुम हो आज भी यही सवाल रहता है की हमसे प्यार काहे किये? अरे तुम पेहली नज़र में ही भा गई थी हमको बस धीरे धीरे तुमको जानने की कोशिश किये हम! तुम्हारी कसम पहले कभी किसी लड़की से बात नहीं किये हम। असल में कभी किसी से प्यार ही न हुआ। पर तुम, तुम एकदम्मे अलग हो! तुमको देखते ही लगा की तुम ही हो जो हमको पुरा कर सकती हो! बड़ा हिम्मत कर के बात किये तुमसे तो फिर थोड़ा थोड़ा ड़र दूर हुआ हमारा, बाकी और किसी लड़की से तो आज भी बात न कर पाते है हम। पर तुमसे कुछो बोल देते है! पता है, तुम सपने में भी आती हो? सुन्दर सुन्दर बोल के तो पेहले ही बहुत परेशान कर चुके है तुमको और दिल की भी उतनी ही साफ हो तुम! तुमको देखते ही एकदम हार जाते है हम, या कहे जीत जाते है? जाने का होता है पर खुद पे बस नहीं रहता। हमारी जिन्दगी में सबसे बड़ा सुकून का दिन वो था जब तुम हमारे कंधे पे सर रख के सोयी थी और हम तुम्हारे सर पे हाथ फेर रहे थे। हमारे पास तुम्हारा सुकून से रहना कितना अच्छा लगता है का बताय...

विंटेज

वैसे किस्सगोई का कोई खास फन था नहीं उसे पर जब प्रेमिका शांत और कम बोलने वाली तो प्रेमी को बहुत जतन करने पड़ते है। किस्सा कुछ पुराना है पर मजेदार है! बात तब की है जब घरों में टेलिफोन हुआ करते थे। उस छोटे से शहर के किनारे पे बसे उस मोहल्ले में बमुश्किल आठ दस घरों में होगा। धीरे धीरे अब सारे घरों में पहुँच रहा था ये दुरी बढ़ाने वाला यंत्र! हाँ बढ़ाने वाला ही। खैर मुझे अभी टेलिफोन की बात नहीं करनी। बात तो मुझे उनकी करनी है जो उस जमाने में भी मोहब्बत को कितनी खुबसूरती से निभाते थे जब आठों पहर नज़र रखने के साधन नहीं थे। ऑनलाइन नहीं तो रिश्ता खतम। इन सब बातों की मुखलाफत करते मोहब्बत करने वाले क्या खुबसूरत मोहब्बत किया करते थे! पाव-डेढ़ पाव खून से लिख कर भी जो आज कल के लड़के मोहब्बत निभा नहीं पाते वो उस वक़्त आँखों के इशारे भर से निभा दी जाती थी! ऐसे ही कुछ थे योगेश और भावना! दोनों का कुछ दस घर के फासलों पे था! योगेश ने पहले पेहल उसे साइकिल से कॉलेज जाते देखा था। स्कूल तक तो लड़कियाँ अलग ही रहती थी। दोस्ती और प्यार के बड़ा खुबसूरत पायदान बने थे। सब अपने वक़्त से होता था। हाँ कुछ दोस्तियाँ मोहब...