माउथ ओर्गन

 बात है 1994 की। नया नया कॉलेज में एडमिशन हुआ था हमारा। ये मोड़ बहुत नया होता है सबके लिये, नये अनुभव नई कहानियाँ नये लोग।

कुछ नये की तलाश में हम में से कई इस दुनिया में खो से जाते हैं।मैं पहली बार घर से दूर जा रहा था सो एक ड़र अपने साथ लिये जा रहा था। पर वो जो एक अलग सी फीलिंग होती है न की अब आगे क्या होगा वो हमारे साथ लगी थी।

प्रयाग तब अलाहाबाद ही था। त्रिवेणी बाँह पसारे मानो कह रही थी “आओ लला तुम्हारी ललक थी!” अलाहाबाद यूनिवर्सिटी में कदम रखते ही वहाँ के कई कायदों से परिचय हो गया।सीनियर सब का भौकाल चलता था वहाँ। दबे सहमे हम दीवाल का साईड पकड़े सर झुकाये सारा फोरमेलिटि खतम किये औ वॉर्डन से बात कर के सब लईका लोग कमरा ले लिया।

रात को दुबक के बैठे बकरों का शेरों ने जो स्वागत किया उसका वर्णन करना यहाँ संभव नहीं है। खैर ठेठ देहाती होने से हमको थोड़ा अपनापन जरुर मिला। धीरे धीरे समय बीता औ हम गंगा माँ की गोद में अपना समय बिताने लगे। इधर कही से टी वी पे सिनेमा गाना में राहुल रॉय आ शाहरुख सब को देख के माउथ ओर्गन का शौख चढ़ा।

अब पैसा तो पहले से ही था नहीं औ बाबूजी से ई बोल के मांगते तो उल्टा लट्ठ पड़ता हमको। सो किताब औ जेबखर्च वाला पैसा बचा के एगो माउथ ओर्गन का जुगाड़ किया गया।

पहला कार्यक्रम तो कमरे में हुआ, फिर सीखते सीखते दोस्त सब के सामने होस्टल में बजाने लगे। गंगा माँ के स्नेह से एक रोज घाट पे बजाना शुरु किये।

उसी रोज घाट पे हम जब उसको देखे तो माउथ ओर्गन पे नया धुन बनाये हम! क्या कहते अपने आप सब होता गया। उसको देखते गये, धुन बनती गई, हम बजाते गये!

वो आयी डूबते सूरज को निहारते घाट की सबसे नीचे वाले सीढ़ी पे हमारे सामने बैठ गई। उस दिन से हम रोज वहाँ माऊथ ओर्गन बजाने लगे ये सोच की किसी दिन वो हमको आके बोलेगी “अच्छा बजाते हैं आप! हमको सिखाइयेगा?” या खाली बस “अच्छा बजाते हैं” ही बोल देती। हम लड़के बहुत मिनीमलिस्टिक होते है न! पर ऐसा कुछ ना हुआ। तीन साल में गिने चुने दिन ऐसे रहे होंगे जब हम घाट पे माउथ ओर्गन न बजाये हो।

रोज मुँह उठाये पहुँच जाते थे औ ऊ कभी अकेले कभी सहेली के साथ आती। मगर कभी उस घाट की 9 सीढ़ी के फर्क को कम ना कर पाये!

उन तीन सालों के बाद माउथ ओर्गन ऐसा छूटा की फिर कभी हाथ ना आया। आज पुरानी ब्रीफकेस में गोल्डेन चमकती उस प्यारी सी धुन को जन्म देने वाली उसको देखे तो याद आया कुछ लोगों कैसे घाट जैसे होते हैं!

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