तस्वीर
“पूरे चार घंटे छत्तिस मिनट लेट चल रही है। अब लगता है रात स्टेशन पे ही बितानी पड़ेगी।” “हूँ” “हूँ का? तुम तो बस एक नॉवेल पकड़ लो और सफ़र भर मुँह बंद कर के पड़े रहो।” “अरे तो का करना है बोल के? तुम्हारे बोलने से जे जल्दी पहुँच तो ना जायेगी।” “अरे सफ़र का मजा भी कोई चीज है।”
“हाँ तो ले रहे है हम तुम चुप करो।” और राघव बाबू वापस से अपना मुँह नॉवेल में डाले पड़ गये। “अमा यार तुमसे तो कुछ बोलना ही बेकार है।” “हूँ” . चार घंटे बाद ट्रेन अपनी जोरदार होर्न बजाती स्टेशन में दाखिल हुई। “शुक्र है तुम्हारा नॉवेल खत्म हो गया था वरना हमे लगा था तुम उतरो ही न।”
“अरे बस कर भाई अब क्या नॉवेल को ले के ही ताने मारता रहेगा।” “हाँ तो अब रात बिताने के लिए कुछ तो चाहिए न? पापा नाईट ड्यूटी के लिए ऑफिस में होंगे और घर होगा बंद। जा के करेंगे क्या?” “चलो वेटिंग रुम सो जाते है।” “तुम सो जाओ हम जगते है। वैसे भी दो घंटो में सुबह हो जायेगी।”
सुबह चार बजे उठ दोनो घर के लिए निकले। “अरे पौने पाँच होने को आये है और पापा अभी तक ना आये है।” “आ जायेंगे। शिफ्ट चार बजे खत्म होती है न।” “लो आ ही गये… प्रणाम पापा।” “जीते रहो…जीते रहो। कब आये?” “जी रात को तीन बजे पहुँचे।” “अरे तो हमको फ़ोन काहे न किया? हम आ गये होते।”
“वो हमको पता था न आपकी नाईट शिफ्ट होगी इसलिए।” “इतने बड़े हो गये हो! हमें पता ही न था… आओ अंदर चलो।” “कैसी चल रही है तुम्हारी नौकरी बेटा?” “जी अच्छी चल रही है पिताजी।” “और बेटा तुम्हारी पढ़ाई? भईया को ज्यादा परेशान तो न करते हो?” “आप न हमेशा भईया के पीछे ही लगे रहो हाँ!”
“अरे ऐसा नहीं है बेटा। तेरी माँ के जाने के बाद इसने मुझे और तुझे दोनो को सम्भाला है।” “पापा…पापा। ए से कहते है तुमको कम बोला करो। बड़ा फालतू बोलने लगे हो आजकल।” “सॉरी भईया।” “का सॉरी। जाओ चाय बनाओ गरमा गरम।” “बेटा अबकी बार आये हो तो शादी करके ही जाना।” “क्या पापा आप फिर से।”
“अरे अब ना करोगे तो का बुढापे में करोगे?” “हाँ बुढापे में ही कर लूँगा।” “सुनो मैंने कमरे में फोटो रख दी है देख लेना। बड़ी गुनी लड़की है। वो हमारे घर आ जाये तो तुम्हारे भाग समझो।” “ठीक देख लूँगा…अगली बार आऊंगा तब।” . “उठ गये?” “जी पापा।” “कहीं जा रहे हो?” “जी। समिति मैदान।”
“आते हुए हमारी दवाई ले आना।” “जी।”
सोच कर तो यही आये थे राघव बाबू की इस बार भी पिताजी को बहला के शादी टाल ही देंगे। उनका मानना था की शादी के बाद से उनका ध्यान पिताजी पर से हट जायेगा। और फिर वो चाहे भी तो भी पिताजी बहू को वहाँ रहने नहीं देंगे। यही सब सोच शादी ना करने का फैसला लिया था राघव बाबू ने। पर कहते है न होइहि सोई जो राम रचि राखा। जिस काम के लिए न आये थे वही होना था इस बार। समिति मैदान से लौटते लौटते रात हो गई। रास्ते में एक लड़की को बचाने में बाईक नाली में गिर गई। नाली से निकले तो पहले लड़की का हाल पुछ्ने चले। लड़की इन्हें देख इतना डर गई की मानो भूत देख लिया हो और भागने लगी।
बाईक की लाईट में बस उसके लहराते बाल, चमकती आँखें और बस एक साइड से उसके डरे हुए चेहरे को देख पाये बेचारे। बाईक उठा म्युनिसिपालिटी वालों को खराब स्ट्रीट लाइट के लिए कोसते हुए वहाँ से चल दिए। पर मजाल है जो नाली या अपनी खराब किस्मत के लिए कुछ निकला हो। . “आह! छील गया है क्या?” Feb 16“हाँ।” “और बता कहाँ दर्द है?” “वो कंधे के उपर… आह हाँ बस वही।” “बोलता हूँ पागलों जैसे गाड़ी ना चलाया कर। आते आते कर दिया न उद्घाटन।” “अरे बाबूजी अब वो अचानक से सामने आ गई तो।” “हाँ हाँ रहने दे। आराम कर।” “और हाँ फोटो देख लेना।” . “लो भईया खाना खा लो। भईया भाभी की फोटो देखी?”
“ना और देखनी भी न है।” “अरे एक बार देख तो लो। बड़ी खुबसूरत है भाभी।” “मैंने एक बार कहा न। जा यहाँ से।” “ठीक है। पापा ने कहा था वरना मुझे क्या। तुम शादी करो या ना करो। यहाँ रख दी है फोटो देखना हो तो देख लो।” . आधी रात जाने किस खयाल से राघव बाबू ने तस्वीर उठाई।
काफी उलट पलट करने पर भी तस्वीर को रात की धुंधली याद से मिला ना सके। कुल मिला के कहें तो वो उस लड़की को देखते तो पहचान जाते पर तस्वीर में वही है या नहीं ये मालूम नहीं कर पा रहे थे। कही न कही मन उस तस्वीर को उस याद से जोड़ देना चाह रहा था मगर ऐसा हो न पा रहा था।
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