दर्शन

 “अबे तुम आज भी किशोर कुमार लगा के बैठे हो! उधर भाभी भोलेनाथ के दर्शन को आई हैं।”

“तो हम का करे? हम का उसके आगे पीछे घुमने का ठेका लिये हैं का? एक्को बार बोली हमको की आज मंदिर जायेगी? पूरे साल भर से घूम रहे हैं ऐसे आगे पीछे।”
“ठीक है तुम ही बताओ ऊ इही मंदिर काहे आई बे?”
“ऊ यहाँ इसलिए आई काहे की यहाँ घाट है। ज्यादा कहानी ना बनाओ बे चुप चाप गाना सुनने दो।”
दरवाजा लगने की हल्की सी आहट के साथ गाने की आवाज ने फिर कमरे को भर दिया
…रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई…

“उसने तो कब्बो हमको ना पूछा। हम उसकी गली जाते है तो कहाँ घर से निकलती है।”…

गाने के बंद होने से पहले ही जनाब कपड़े पहन बाल बना के तैयार हो चुके थे।
“चलो यार… प्यार जो ना कराये!”

घाट पे सूर्य देव को जल चढ़ाते उसे देख बेचारा सारा गुस्सा भुल गया!
“कितनी खुबसूरत है यार ये।”
धीरे धीरे बहते पानी पे पड़ती किरणें जब उन हवा के साथ खेलती झुमकों से टकराती तो लगता जैसे बस काश ये सब यही रुक जाता और वो इसी लम्हें में ठहर जाता!
“इत्ती देर काहे लगा दी?…हाँ? बोलो अब।
आज काहे नाक चढ़ाये हो?”
“अरे नहीं कुछो नहीं।”
“बोल भी दो।”
“तुमको कैसे पता चल जाता है यार?”
“हम ठहरे तेज। पर कभी घमंड ना किया।”
“अरे बोलो ना।”
“ऐसे शकल बना के रखोगे तो…”
“कैसी शकल बना के रखी है हमनें।”
“चलो छोड़ो अब ये सब आओ तुम्हारे साथ पूजा करनी थी बेवकूफ।”
“हम्म!”

“सुनो हाथ पकड़ो हमारा।”
“सच्ची?”
“तो का हम शंकर जी के सामने मजाक कर रहे है। हुह…”
पण्डित जी से आशीर्वाद से दोनों मंदिर की परिक्रमा करने लगे।
“तुम ना एकदम पागल हो!”
“अब का किया?”
“कुछो नहीं चुप रहो।”
“अरे…”
“कहा ना चुप।”

“सुनो एक बार और घंटी बजाओ हमारी तरफ से…
अरे हमारा हाथ पकड़ के नहीं पागल!”
“घाट पे बैठे थोड़ी देर?”
“ना मम्मी राह देखती होंगी।”
“ठीक है चलो…
अरे इधर कहाँ जा रही हो?”
“घाट पे! नहीं चलना है?”
“हाँ चलना है ना।”
दोनों घाट की सीढियों पे हाथ पकड़े बैठे थे तभी उसके कंधे पे उसने सर रख दिया।
“अरे सुबह सुबह नींद आ रही है का?”
“चुप रहो ना तुमको कुच्छो समझ नहीं आता।”
….
“अरे अब तो धुप निकल आई मम्मी जान लेंगी चलो अब।”
“हमारा मन ही नहीं हो रहा।”
“तो का धुप में काले हो तुम्हारे साथ। हम तो चले।”
दोनों उठ कर धीमें धीमें चलने लगे। अलग होने का मन तो दोनों में से किसी का न था पर…
“औटो …”

“आखिर मिल ही आये न भाभी से?”
“हाँ।”
“हम जानते थे तुम रुक न पाओगे।”
“चुप रहो बे हम रह सकते है ऐसे भी।”, हल्की सी खिसियाहट के साथ वो बोला।
“हाँ ऊ तो दिखे रहा है।”
“तो देखो निपोरो मत।”

दो महीने बाद जब उसकी नौकरी लगी तो पेहला काम जो उसने किया वो था लड़की के पिताजी से मिलना।
दान दहेज से पहले ही दूर थे और मोहब्बत मिलने की खुशी में लटपटाये कुछो बोले जा रहे थे जनाब।
“सर, आई मीन अंकल, मतलब पिताजी… अरे माफ किजीये सर। मैं विनोद, आपकी बेटी से बहुत प्यार करता हूँ। आप अपनी बेटी मुझे दे दिजीये वो मेरा खयाल रखेगी, मेरा मतलब है मैं उसका खयाल रखूँगा। वो मुझे जानती है, आई मीन चाहती है, मतलब आप उससे पूछ लीजियेगा!”
“सुनो जेन्टलमैन जरा आराम से। पिताजी के साथ मुझसे आ के मिलो। फिर बात करेंगे।”
बाबूजी बेटे की नौकरी लगने पर बड़े खुश थे सो उनको मनाना कोई मुश्किल काम न था। मुश्किल तो था माँ को मनाना पर बहू को देख वो भी मान गई!
आजे के दिन दो साल पहले शादी हुई थी उसकी!
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…रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई…💕


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