पीला गुलाब

 स्याह रातों की ओर ढ़लता हुआ सूरज एक बेमेल शाम से कह रहा था “क्या हुआ तुझे? आज इतनी मद्धम क्यों है?”

शाम जैसे उदास सी थी। हल्की हल्की सरसराहट से पत्ते बार बार झूम उठते थे। घर को लौट रही चिड़ियों की टोली हल्की हल्की आवाजें निकाल शांती को पल भर के लिए तोड़ देती।

पर इन सब के होते एक उदासी सी आसमान में फैली हुई थी। एक ऐसी उदासी जो इन सब से परे थी, एक उदासी जो शाम से कही ज्यादा मेरे मन में थी!

लाल से गुलाबी होते होते कैसे आसमान ने मन में उदासीनता के बादल ला दिये पता ना चला।

खत तो एक बार फिर लौट आया था। पर पता तो यही दिया था, फिर? कोई बात नहीं शायद काम से कही गये होंगे।

और यादों ने खींच कर पीछे कर दिया। पाँच खत और दो साल पीछे। और खत में था भी क्या?

“अमित,

ठीक तो हो? हर वक्त ये फिक्र रहती है की तुम कैसे हो मगर सिसकियाँ रोक लेती है उस सवाल को हर बार।इस बार शायद खत मिल जायेगा तुम्हें तो जवाब लिख भेजना।

लिख भेजना तुम क्यों गये! तुम्हें पीला गुलाब जो दिया था, हो सके तो उसकी एक पंखुडी भेज देना!

तुम्हारी सुरभि!”

अमित को गये दो साल हो गये थे। इन दो सालों में अगर सुरभि को कुछ मिला तो वो था अमित का पता पर उस पते पर जाने की हिम्मत उसे ना मिली।

सो उसने खतों में सहारा ढूंढा। मगर वो सब बेरंग ही लौट आये।

जाने कितनी ही बातें कहनी होती थी उसे जो उन पाँच लाइनों में सिमट के रह जाती जिनका कभी जवाब ना आता। मगर ये सिलसिला था की रुकता ही ना!

आखिर अमित क्यों गया? क्या वजह रही उसके जाने की?

और इस लड़ाई में वो रोज हर पल खुद को हारता देखती, खुद को गलत ठहराती, दलीलें देती, कोसती, और फिर सिसकती!

दिलासे बस धड़कनें धीमी कर देते हैं, साँसों की रफ्तार कम कर देते हैं पर उनसे मन नहीं मानता! दिलासों ने कभी काम नहीं किया। अमित उसके दिलासों में भी कभी लौट कर नहीं आया क्योंकि उसने कभी अमित को लौटने नहीं दिया!

वो खयाल भी में भी कभी उससे नजरें ना मिला पाती। उसकी गलती उसे रोक लेती। वो गलती जो शायद उससे कभी हुई ही नहीं थी!

पर सवाल वही था, अमित क्यों गया?

बारह खतों और साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद अब उससे रहा नहीं गया।

ट्रेन की सीटी ने उसे उसकी ख्वाब से निकाल फेंका जो वो खिड़की से सटे देख रही थी। एक जोर की आवाज और ट्रेन एक धक्के से स्टार्ट हो गई। घड़ी की ओर नजरें टीकाए और खुद से जद्दो-जहद करती वो उस पते के करीब तो जा रही थी पर उसे ये समझ नहीं आ रहा था की उसका एक हिस्सा उससे कही दूर क्यों भागा जा रहा है!

वो वहाँ क्या बोलेगी? क्या वो उससे नजर मिला पायेगी, क्या कुछ बोल पायेगी? ये सब कहानियाँ और सवाल दोहराए जायेंगे?

पलक झपकी और वो पहुँच चुकी थी! नींद सब परेशानियों को मार देती है।

ढूंढते हुए एक गली के कोने पे एक बंद मकान मिला। सूखे गुलाब के पेड़, कुछ अजीब सी बढ़ी झाडियाँ ये बता रही थी की मकान में काफी दिनों से कोई नहीं था।फूलों सी कुम्हलाई सुरभि बस ये यकीन को पक्का करने को बढ़ रही थी की मकान खाली था।

मकड़ियों के जालों से ढ़के ताले ने यकिन को पक्का कर दिया। घर में कोई नहीं था।

दरवाजे के बगल में लगी घंटी के नीचे एक बोर्ड पे लिखा था, “यह मकान दिवंगत अमित मिश्रा का है। खरीदने के लिये सम्पर्क करें।”

तेजी से बाहर भागते हुए उसके कदम एकबारगी ठिठक गये। गुलाब की क्यारियों के बीच एक गुलाब का पौधा जीता था, पीले गुलाब का!

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