पूरनमासी
बरसाती पानी आज अलग ही शोर कर रहा था। मन जब कभी अशांत हो तो बारिश नहीं होनी चाहिए, बारिश उस अशांती को और बढ़ा देती है, याद…
ये घर के बीच में आंगन का आइडिया शगुन का था। सुबह की पेहली किरण हो, शाम का ढलता सूरज, बारिश का पानी या पूरनमासी का चांद उसे सब से प्यार था!
योगेश की जिन्दगी में जैसे पूरनमासी शगुन से ही आई थी। क्या होता है प्यार ये सवाल अगर कोई उससे पूछता तो शायद वो शगुन की तस्वीर दिखा देता। शगुन और उसका रिश्ता उन बहुत कम मोहब्बत की कहानियों में से है जो कॉलेज से शुरु होकर भी मुकम्मल हुए, शादी में तब्दील होकर!
किस्मत किस्मत की बात।
पर किस्मत अच्छे लोगों पे मेहरबान कहाँ होती है। सुख का छलावा हमेशा दुख के ढेर लिए मौके की टोह में बैठा होता है।
शगुन की मौत ने योगेश को तोड़ दिया! पूरी जिन्दगी अकेलापन झेलने वाला इंसान भी बिखर गया। कभी कोई उसके साथ ना रहा था, माँ-बाप दोनों बचपन में ही छोड़ गये और अब ये…
उसके बाद जाने कितने दिन ही उसने कमरे में बंद हो गुजारे। वो आंगन जाने कितने आसुओं का गवाह रहा होगा जो हर रात शगुन से की बातों को याद किये जाने दौरान बही थी। अपने को खो देने का गम अब सहन से बाहर हो गया था।
वक़्त के साथ यादों की परत धुन्धली हो जाया करती है पर ऐसी बारिशें… उफ्फ
आज पन्द्रह साल हो गये उस हादसे को और अब बरसाती पानी के छींटे योगेश पे उड़ाने, मूनलाइट डिनर करने की यादें आज भी जो अचानक ही कचोट उठती है उसे उनसे निपटने को कोई उसके साथ नहीं।
काले आसमान में आड़ी तिरछी लकीरें खींचती हुई बिजली चमकी और खयालों की दुनिया को शीशे की तरह बिखेर दिया।
घड़ी की टिक टिक मानो कह रही हो इसमें कोई बुराई नहीं है, आखिर प्यार उम्र नहीं देखता। हर किसी को साथ की जरुरत होती है, और फिर आजकल लोग इसे बुरा नहीं मानता! उम्र बस एक पड़ाव ही तो है।
फिर राधा कितनी अच्छी लड़की है, हमेशा हँसते खिलखिलाते रहने वाली।
उसका साथ जैसे उस बरसों पुरानी जमी धूल को झाड़ने का काम कर रही है।
इसी उधेड़बुन में जाने कब बारिश थमी और कब उसे नींद आ गई।
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इस वक़्त कौन है दरवाजे पे..
“आप?”
“जी मैं, नहीं आ सकती क्या?”
“अरे जरुर, क्यूँ नहीं? पर ऐसे अचानक।”
“आप सबसे पहले बस स्टैंड पहुँच जाते है, आज आप लेट हुए?”
“जी तबियत थोड़ी बिगड़ी हुई सी लगती है, कल दफ्तर से आते वक़्त भीग भी गया था। आप क्यूँ नहीं गई?”
“जी मैंने सोचा आपको देख लूँ, फिर सब ठीक रहा तो मैं चली जाऊँगी।”
“अरे आप तकल्लुफ ना करें, सब ठीक ही है। आप आराम से जाइये।”
“कोई बात नहीं काफी छुट्टियाँ पड़ी है और घर पे कोई है नहीं।”
“मैं आपके लिए चाय बनाता हूँ!”
“अगर आपको ऐतराज ना हो तो…”
“ऐतराज तो नहीं पर आप मेहमान है।”
“फिर मैं बनाती हूँ!”
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और राधा किचन में चली गई
“सुनिये चाय की पत्ती किधर है?”
अचानक ही राधा की ये पुकार सुन उसे अजीब सा लगा, वो क्या कहते है बटरफ्लाईज इन स्टमक!
“जी ये उपर की दराज में।”
कैसे किसी का साथ जैसे सब बदल देता है। रात भर बेचैन किये सारे खयाल ऐसे गायब हो गये थे जैसे तेज हवाएँ बादलों को गायब कर देती हैं। राधा में सचमुच कुछ अलग था, कुछ ऐसा जो उसने इससे पहले सिर्फ शगुन में महसूस किया था। राधा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी जैसी योगेश की।
फर्क बस इतना था की योगेश राधा की मन की बात ना जानता था।
शादी के कुछ दिनों पहले राधा के होने वाली पति की गाड़ी का ऐक्सीडेंट हो गया। पिताजी चल बसे और वो खुद बड़ी मुश्किल से बचा। लड़के वालों ने जाने कौन कौन से ताने दिए और शादी टूट गई।
इतना सब झेलने के बाद राधा ने कभी शादी नहीं की
उसके माँ पिता वापस गाँव चले गये और तब से वो अकेली रहती है।
“राधा जी आपने खाना क्यूँ बनाया?”
“मुझे भूख लगी थी!”
“मेरी वजह से आप बेवजह परेशान हुई।”
“किसने कहा मैं यहाँ आ कर परेशान हूँ।”
राधा के चेहरे पर उस मद्धम मुस्कान में जाने कौन सी शक्ती थी जो आज योगेश को खींचे जा रही थी।
इस मामले को निपटे कुछ ही दिन बीते थे और आंगन में बैठे बादलों के बीच छुपते दिखते चांद से बतियाते योगेश सोच रहा था की आखिर इस उम्र में दिल की बात बोली कैसी जाती है।
क्या ‘आई लव यू’ ये बताने के लिये काफी होगा या फिर उनके जमाने की तरह खत लिखने होंगे या आँखों में होने वाली वो बातें सारी रात वो बैठा सोचता रहा ऐसे तरीके को जिससे वो राधा को अपने दिल की बात कह सके और उसे बुरा ना लगे।
उस दिन दफ्तर तक का सफ़र बड़ा अजीब था। राधा के साथ चलते उसने मेहसूस किया की दिल की बात को कहने के लिये सही वक़्त तक इन्तजार करना कितना मुश्किल होता है।
“राधा जी आप चाय बहुत अच्छी बनाती है। मुझसे शादी करेंगी?”
ये था उसका प्रोपोजल!
राधा का चेहरा जैसे सुन्न हो गया। एक पल को योगेश को लगा जैसे उसने सब गड़बड़ कर दी ये क्या बोल दिया।
इस उम्र में प्यार? ये सब मेरी बेवकूफी थी।
अभी उसके मुँह से “माफ़ किजियेगा राधा जी वो मैं” निकलने ही वाला था की उसने देखी राधा के होठों पे तैरती वही मद्धम मुस्कान…
“हाँ!”
अभी उसके मुँह से “माफ़ किजियेगा राधा जी वो मैं” निकलने ही वाला था की उसने देखी राधा के होठों पे तैरती वही मद्धम मुस्कान…
“हाँ!”
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