मार्तण्ड
मृगशिरा की चांदनी थी। तेज गिर रहे जलप्रपात से उठते धुन्ध ने ब्रह्म मुहूर्त की वेला को मानो स्वर्गातीत कर दिया था।
जंगल के बीच बनी कुटिया में रह रहे उस योद्धा ने बाहर निकल जलप्रपात को नीचे से ऊपर तक निहारा।
वरुण देव के समक्ष नतमस्तक उस शूरवीर ने पूर्ण समर्पण के भाव से नमस्कार किया और उस पर्वत के नीचे बने उस जलाशय में उतर गए।
रोज का यही नियम था। वर्षों के रक्तरंजित के उपरांत इस निर्जन वन में उस शौर्यवान तलवार का प्रयोग शायद ही पुनः कभी हुआ हो।
अब तो ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक जल में निमग्न महादेव की उपासना का कार्यक्रम ही सतत चलता था।
अपने राज्य की माता गङ्गा को स्मरण करते वीर ने बाहर कदम रखे। छाती को चीरती एक लंबी सी लकीर मानो गर्व से चित्कार कर कह रही थी, "ये गौरव गाथा है मेरे जीवन की, एक क्षत्रिय की!"
नदी से बाहर कदम पड़े ही थे कि पीछे वट के पेड़ में छिपा बैठा सिंह उस निहत्थे पर कूद पड़ा।
एक प्रहार और पंजे पीठ में धंसते चले गए। दाहिने हाथ को जमीन पर टिकाते उसने अपना संतुलन बनाया।
रक्त की एक धार सीधे सिंह के मुँह जा लगी थी। उसका पीले घास सा चेहरा गाढ़ा लाल दिख रहा था।
योद्धा ने बिना पलटे उसकी छाती को बायें हाथ से पकड़ा और अपने शरीर का पूरा वजन लगाए उसकी दाढ़ पकड़ उसकी पीठ पर जा पहुंचा।
जाने कितने दिनों से युद्धाभ्यास न किया था। रण में कदम रखे मानो सालों बीते हो पर क्या सिंह और क्या सिंहासन, दोनों आज भी मार्तण्ड के अधीन ही थे...
गर्दन पर एक प्रहार और सिंह ने वही प्राण त्याग दिए। निहत्थे शेर बाघों से दो-दो हाथ करने का ये कोई पहला मौका नहीं था।
मार्तण्ड ऐसे कौतुक अनेकों बार कर चुका था। परंतु अब ऐसे आमोद-प्रमोद उसके जीवन से परे थे।
दिन और माह बीतते गए। प्रकृति ने भी मार्तण्ड के जीवन से हिंसा को दूर ही रखा था।
शायद महाकाल आने वाली आकस्मिक परीक्षा का उद्गार नहीं करना चाहते थे। एक परीक्षा जिसकी स्याही रक्त होने वाली थी...
एक ठंडी शाम हवा की आहट हुई। फड़फड़ाते पंखों ने उस कुटिया के बाहर आकर विराम लिया।
गहन विचारों में बंद आँखों खोये मार्तण्ड की पलकें अचानक खुली। वो दौड़ा बाहर आया।
संदेश!!!
वल्लभ। वर्षों पुराना वफादार।
"क्या संदेश लाये हो मित्र?", मार्तण्ड ने मन ही मन अपने पंछी मित्र से बात की।
वल्लभ ने भी जैसे नजरें नीचे कर आगामी समस्या की सूचना दे दी।
"जगन्नमाता मंदिर संकट में है। वीभत्स शत्रु घात लगाए बैठा है। महेंद्र शासन नहीं चला पायेंगे। उन्होंने भले आपके पिता का रक्त पाया हो पर उनका शौर्य समग्र रूप से आपने ही धारण किया है।
क्षमा कीजिएगा महाराज, राज्य आपको पुकार रहा है। महेंद्र देव को सिंहासन खाली करना होगा।जगन्नमाता और राज्य दोनों की रक्षा अब आपके समर्थ हाथों में है।"
आपका विश्वसनीय
देवेन
"भैया, ये आपने क्या किया? पिताजी के वचन अनुसार मैंनें ये चक्रवर्ती सिंहासन आपको सौंपा। परंतु सत्य ही है, राज्य बाहुबल से चलता है। इस चतुर्दिक् राज्य को नियंत्रित करने का बल आपमें निश्चय ही नहीं है।
हे माँ, मैं लौट रहा हूँ।
"तेज हवा चली। प्रपात का जल जैसे पर्वत से कुछ दूर हट कर गिरने लगा था।
पत्तों की सरसराहट ने जैसे बादलों के गर्जन जैसा शोर किया।
"विश्वा..."
चारों ओर हुंकार गूंज उठा। मार्तण्ड की पलक भी ना झपकी थी कि टापों की आवाज ने जंगल को जीवंत कर दिया।
"चलो मित्र, जगन्नमाता पुकार रहीं हैं!"
विश्वा ने दोनों पैरों को ऊपर उठाकर यूँ पटका मानों उस एक प्रहार से सैकड़ों शत्रु विदीर्ण किए देता हो।
क्षण भर में मार्तण्ड के केश हवा से बातें कर रहे थे।
"शीघ्र चलो मित्र। जाने हमारे लोग उन आक्रांताओं का सामना कैसे कर रहे होंगे।"
विश्वा ने पूरा जोर लगाया। रात भर न मार्तण्ड की पलक झपकी न विश्वा के पैर क्षण भर को रुके।
भोर होने से पहले वो अपने राज्य की सीमा पर था। परंतु...
नगर मानों जल रहा था। दुर्ग की दिवारें रक्त और सैनिकों के शरीर के टुकड़ों से पटी पड़ी थी।
"हे माँ। ये कैसा विध्वंश है।"
"महाराज ऽऽऽ...", किसी देह से एक दारुण पुकार निकली। मार्तण्ड नीचे उतरा।
"महाराज, जगन्नमाता... ये असुर माता के प्रांगण को दूषित करने बढ़े हैं। अपने नगर को बचा लो माधव!"
"माधव! मैं?"
"इस युद्ध में नर और नारायण दोनों आप हो स्वामी। जल्दी जाओ।"
मार्तण्ड ने और समय व्यर्थ नहीं किया। विश्वा जैसे सारी बातें समझ पहले से तैयार था। अभी मार्तण्ड बैठे ही थे कि वो द्रुत गति से शत्रुओं के बीच कूद पड़ा।
"ठहर जाओ।"
आक्रोशित मार्तण्ड ने उत्तर की अपेक्षा नहीं की। उसकी तलवार मलेच्छों के शीष उतारते बढ़ती चली गई।
रक्त की धार फूट पड़ी।
सैंकड़ों बुतशिकन और अकेला मार्तण्ड। पर शंका कैसी? इस नश्वर शरीर पर कुछ और दाग सही!
जो जनता महेंद्र के कुशासन में डरी सहमी सकुचाते बैठी थी मार्तण्ड के प्रताप ने उन्हें शौर्य दिया।
मार्तण्ड अब सूर्य हो चला था।
पूरा नगर उसकी आभा से प्रकाशमान हो रहा था। मलेच्छों के पांव उखड़ने लगे।
जिन्होंने महेंद्र को घुटने टेकते देख सोचा था कि अहिंसा के रास्ते बढ़ चले ये नपुंसक कुछ ना कर पायेंगे उनके आँखों में भय साफ-साफ नजर आ रहा था।
मार्तण्ड ने महाकाल की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।
जगन्नमाता वीभत्स रूप लिए रणभूमि में नाच रही थी। जगदंबिका रणचंडी बने तांडव कर रही थी।
मार्तण्ड का शरीर पसीने और शत्रु के रक्त से छलक रहा था।
उसका मस्तक उगते सूरज के जैसे नवप्रभात का सूचक बना हुआ था।
"महाराज मार्तण्ड देव की जय!"
"जगदंबिकापत्य मार्तण्ड देव की जय।"
वर्षों के उपरांत नगर को उसका महाराज मिला था और जगन्नमाता जगदंबिका को उनका पुत्र।
नमो नमः।🙏
विज्ञान. 🚩
प्रेरक कथा।
ReplyDelete" जगन्नमाता " खटक रहा है। जगन्माता कर सकते हैं। जगत् +माता।