अल्का. ❤

इतने दिन बाद गाँव जा रहा था कि गाँव के रास्ते भी अब मुझे देख पूछते से लग रहे थे "कहाँ थे बऊआ इतने दिन?"

खैर हम भी ढ़ीठ सो तिस पर भी मुँह उठाये बढ़े जा रहे थे। 

पर इतने साल बाद अब गाँव की सड़क पहचान में नहीं आ रही थी! खेत भी बदल से गये थे। बढ़ती पीढियों ने खेत बाँट दिए थे।

गाँव के बाहर ही हम जीप से उतर गए, सुबह की हवा बहुत दिनों बाद मुँहजोरी कर रही थी!

आम बौरा रहे थे, और बांस की कटाई हो रही थी।

ढलाई वाली सड़के चिढ़ा रही थी "क्यों जब छोड़ गये थे तब गढ्ढे थे ना इधर?"

सब बदल सा गया था पर गाँव कि वो सुगंध बरकरार थी।

अभी गाँव का बॉर्डर क्रॉस ही किया था कि "अरे गट्टू? कैसे हो?" ने एकदम से जैसे 6 साल पीछे खींच लिया।

"ठीक है चचा, आप?"

"अरे हमको का होगा लला। सब महादेव की दया है।"

"औ चाची?"

"चाची एकदम ठीक है बस ई सोनुवा बऊरा गया है आजकल।"

"का हुआ चचा"

"अरे पढ़ता ही न है बुड़बक"

"हहा अरे लड़का है अभी चचा सीख जायेगा"

"हाँ लला चलो बागान में मट्ठा भेजी है आज चाची तुम्हारी पी के घर जाना"

"न चचा अभी चलते है अम्मा से मिले कितने बरस हो गये! राह देखती होंगी शाम को आते हैं।"

"अच्छा गट्टू। भईया को कहना हम बांस कटवा दिए है सब।"

"ठीक चचा"

कुछो तो ना बदला गाँव में सब वैसे है। आज भी लोग अचानक टोक के पूरे घर परिवार की बात कर लेते है, एक दूसरे का काम बिना किसी रिश्ते के कर देते है।

गट्टू के बाबूजी का कोई भाई न था पर पूरे गाँव में भईया जी का नाम चलता था। नाम कब पड़ा कैसे पड़ा इसका कोई ठीक ऐतिहासिक वर्णन न था।

"अम्मा ओ अम्मा आय गये हम"

"अरे मोरा लल्ला, ठहरो ठहरो कहाँ घुसे आ रहे हो रुको वहीं"

"का हुआ अम्मा अंदर भी ना आने दोगी अब! एतना गुस्सा?"

"चुप बुड़बक करने दे उसको जो कर रही है"

"प्रणाम बाबूजी!"

"जीते रहो"

"लखन चचा बांस कटबा दिए है"

"अच्छा तुमको कब मिला?"

"बस..."

"चुप हो जा लल्ला... हे माँ सारी नजर दूर कर इसपे से। केतना दूबरा गया है लला? खाता नहीं था का? सारा दिन कामे करवाता है सब शहर वाला? खाना ठीक नहीं मिलता था ना? कहते थे कामवाली रख ले टिफिन खा के का होगा!"

"अरे अम्मा आराम से ठीक तो है हम। जिम भी जाते थे"

"आग लगे तुम्हारे जिम जाम को। अब इहा आये हो तो घी वाला परांठा खिलायेंगे रोज। थोड़ा मोटा जाओगे तो खराब ना लगोगे।"

"अच्छा अम्मा अब अंदर आये?"

"आ ना हम रोके है का तुमको। कौनौ बात का आदर नहीं है अरे माताजी का आशीर्वाद जरुरी है कि नहीं? बोलिए ना आप"

"तुम ही समझो अपने लला से हम चले"

"गट्टू नहा ले खाना लगाते हैं!"

"ठीक है अम्मा"


6 साल बाद घी की महक आज गट्टू की माँ को भी अच्छी लग रही थी। इन 6 सालों में घी तो बस गट्टू के बाबूजी के लिये ही निकालती थी वो। आज उनका लल्ला आया है वो भी खायेन्गी!

"लाओ अम्मा... अरे का का बनाई हो? आलू परवल, कटहल, आम के चटनी, खीर भी बनाई हो का अरे वाह"

"खाओ ना लला केतना साल हुआ तुमको खिलाए हुए"

"खिला ना दोगी अम्मा?"

जेठ में ऐसे ही बरसात होती है।

"अम्मा हम बागान जा रहे हैं"

"अच्छा नाश्ता ना करोगे कुछ"

"ना उधरे खा लेंगे कुछ"

"का मिलेगा उधर?"

"गाँव में बहुत कुछ है अम्मा"

"अरे रुक तो"

"आते हैं"

"आ गये गट्टू, बैठो। मट्ठा बचा है थोड़ा पियोगे?"

"दिजीये"

थोड़ा के नाम पे दू लोटा मट्ठा पीला के चचा पूछे, "औ ला दे घर से तुम्हरी चाची औ रखी है घर पे"

"ना चचा बस हुआ इतना बहुत था"

"कमजोर हो गये हो गट्टू खाया पिया करो"

"चचा कुश्ती होती है अभी भी?"

"हाँ अखाड़ा तो चल रहा है"

"का बतीया रहे हो गट्टू से लखन"

"कुछ ना भईया बस गाँव के हाल चाल"

"ऊ बताये जो हम कहे थे?"

"न भईया अभी तक न"

"गट्टूआ तुमको बड़ा मानता है लखन सो तुमको कहे थे"

"का बात है कहिये ना चचा"

"बियाह करोगे गट्टू!"

"देखो गट्टू अब उमर हो गया है तुम्हारा। नौकरी उकरी करने लगिये गये हो। बियाह कर लो सो तुम्हारे रहने खाने का फिकर ना रहेगा तुम्हारी माँ को। ना यहाँ तो तुम्हारी चिंता में ही हलकान हुई जाती है ऊ"

"जी बाबूजी"

बाबूजी को आशा ना रही होगी इतना आसान स्वीकृति की!

गाँव आते हुए ई बात मन में कौंधी जरुर थी कि अम्मा शादी को कहेंगी पर जब बाबूजी ने कह दिया तो गट्टू मना ना कर पाया!

"तो कहो लखन लड़की दिखा ले?"

बाबूजी के सामने गट्टू ढंग से शरमा भी ना पा रहा था।

"अरे भईया हम आजे बात करते हैं"

दिन नियत हुआ। लड़की दू गाँव छोड़ रामधारी बाबू की सुपुत्री थी। लखन चचा के पसंद की थी सो गट्टू कुछ न बोला।

दिखाई के लिये लड़की वाले गाँव के नरसिंह बाबा के मंदिर आये। गाँव की पुरानी मान्यता थी की नरसिंह बाबा के आशीर्वाद से यहाँ से शुरु होने वाली शादी में कोई बाधा नहीं आती।

अनऑफिसियली शादी ठीक हो चुकी थी।

जब दोनों नरसिंह बाबा के सामने बैठे तो उम्मीद थी की सारा ध्यान बाबा पे होगा पर गट्टू बाबू से सब्र ना किया गया सो कनखियों को जिम्मा सौंपा गया!

काम आसान नहीं था सो ध्यान देना जरुरी था। ना ही चेहरे पे कम ध्यान देना था ना इसपे की कोई देख ना ले।

इतनी सारी मुश्किलों के बाद भी मिशन पुरा हुआ। नरसिंह बाबा के सामने मोहिनी अवतार था!

दिल हिलोरें मार रहा था और मन चाह रहा था कि बोल दे "लखन चा शादी ठीक कर'अ महाराज"

इत्ते में लखन चचा बोले, "तो शगुन बदला जाय?"

इससे पहले लखन चचा के लिये कभी गट्टू के दिल में इतना प्यार न आया था।

रामधारी जी बोले "काहे नहीं? पर लड़का लड़की बात करेगा तो कर ले पहले!"

"जरुर जरुर" ,बाबूजी बोल उठे।

"जाओ गट्टू अल्का को ले जाओ"

गट्टू का दिल कैसे धकधका रहा था वही जानता था!

"आ..आइये"

एक आधे मिनट का लम्बा मौन सब रोक के रखे था जैसे एकदम जोरदार वाला तूफान आने वाला हो!

"आपका नाम?"

"अल्का, बाबूजी बोले थे न अभी"

"हाँ जो वो... जी"

"मैं गोविंद"

"जानते हैं हम"

"और क्या क्या जानती हैं आप?"

"बहुत कुछ!"

"बताइयेगा?"

"उन्हू"

"अच्छा आपको कुछ पूछना है?"

"हम पसंद है आपको?"

"हैं? हाँ जी बहुत मतलब जी... हाँ पसंद हैं!"

"आप सिगरेट पीते हैं?"

"एक बार पी थी दोस्त ने जबरदस्ती पीला दी, फिर कभी न छुए"

"अच्छा"

"मैं टीचर हूँ पता है आपको?"

"हाँ लखन चचा बोले थे"

"जी मैं आगे भी पढ़ाना चाहती हूँ "

"ई तो अच्छा बात है"

"आप रोकेंगे तो नहीं?"

"रोकेंगे काहे हम भी तो काम करते हैं"

"जी"

"चलें?"

"जी"

"बात कर लिये गट्टू?"

"जी चचा"

"तो अब शगुन बदला जाये रामधारी जी? क्यों बेटी कैसा लगा हमारा गट्टू?"

"चचा गट्टू नहीं!"

और इन सब में अल्का का झुका चेहरा मौन स्वीकृति दे रहा था।

शगुन के साथ साथ फोन के नम्बर भी अदला-बदली हुए!

गट्टू "अल्का❤" कर नम्बर को सेव करते हुए ऐसे लाल हुआ जा रहा था मानो अभी टमाटर हो जायेगा।

गाँव की शादी बड़ी विचित्र होती है।

परम्पराओं की ऐसी यात्रा जो आपको कहीं और देखने को ना मिलेगी।

दिन ठीक हुआ अगले महीने का और शादी ठीक होने से ले शादी होने तक कैसे प्रेम बढ़ता है ये गट्टू को मालूम होने लगा!

फोन इससे पहले कभी इतना जरुरी ना हुआ था। ना किसी नोटीफिकेशन पर इतनी तेज दिल धड़कता था।

कौलर ट्यून स्पेशल बदले जा रहे थे।

शादी के इन्तजार में बहुत कुछ बदलता है। एक लड़का एक पुरुष बनता है जो अब ये समझने लगता है की जिम्मेदारियाँ क्या होती है, जो ये समझता है की उसे जिम्मेदारियाँ उठानी है।

ये परिवर्तन बहुत बड़ा होता है।

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