परी...♡

उसे घुमने की बहुत चाह थी। सर्दी की रात में चांद से बिखरती रौशनी को सफेद बर्फ से टकराते देखना और पेड़ से गिर रही ओस की बूँद का उसे बिखरा कर फैला देने जैसे सपने उसे रोज आया करते थे। के किन्ही कोनों में मैं भी होता था उसका हाथ थामे।
उन सपनों के किन्ही कोनों में मैं होता था उसका हाथ थामे।
और जब चांद की रौशनी देख उसकी आंखें चमक उठती और वो मेरे हाथों को थोड़ा कस कर भींच लेती मैं बस सहम उठता।
सहम उठता की ये हाथ कभी छूट ना जाये!

खैर उसकी एक ख्वाईश थी। हिमाचल के किसी पहाड़ी गाँव में बर्फ पे पड़ती सूरज की किरण देखते हुए सुबह की चाय पीना, मेरे हाथों से बनी!
जाने कितने बार ये ख्वाईश मेरे सामने दोहराई उसने... कईयों बार...
उसे चांद पसंद था और चांद को वो।
हर शाम चांद निकलते के साथ वो उसे देखने बालकनी में निकल आती।
जो वो ना आती तो चांद भी बादलों, पेड़ों के पीछे छुप जाया करता!
उसकी एक बड़ी सुन्दर ख्वाईश थी। दूज के चांद पे जैसे लड़की की वो तस्वीर बनाया करती थी वैसे ही चांद पर बैठ पूरी धरती का चक्कर लगाना।
कहती, तुम मेरे साथ बैठ जाना अकेले मन नहीं लगेगा ना। तुम साथ रहोगे मन लगा रहेगा!
उसे नदियाँ, झील, तालाब बुलाया करते थे। वो उनमें पैर डाले उनसे घंटों बातें करती।
बहता पानी जैसे उसे छू महक उठता जैसे चांद उसे देख और चमक उठता था!
उससे बात करने चिडियों की कतारें लगती। उनका संगीत और मधुर हो जाता उसे सुनकर!

ओस कुछ और ठंडी हो जाती, बर्फ कुछ और सफेद!
वो कुछ और ही थी।
इस दुनिया में ऐसे लोग नहीं होते।
वो इस दुनिया की नहीं थी... परी थी... यू नो!
उन सपनों के किन्ही कोनों में मैं भी होता था उसका हाथ थामे।
और जब चांद की रौशनी देख उसकी आंखें चमक उठती और वो मेरे हाथों को थोड़ा कस कर भींच लेती मैं बस सहम उठता।
सहम उठता की ये हाथ कभी छूट ना जाये!

खैर उसकी एक ख्वाईश थी। हिमाचल के किसी पहाड़ी गाँव में बर्फ पे पड़ती सूरज की किरण देखते हुए सुबह की चाय पीना, मेरे हाथों से बनी!
जाने कितने बार ये ख्वाईश मेरे सामने दोहराई उसने... कईयों बार...
उसे चांद पसंद था और चांद को वो।
हर शाम चांद निकलते के साथ वो उसे देखने बालकनी में निकल आती।
जो वो ना आती तो चांद भी बादलों, पेड़ों के पीछे छुप जाया करता!
उसकी एक बड़ी सुन्दर ख्वाईश थी। दूज के चांद पे जैसे लड़की की वो तस्वीर बनाया करती थी वैसे ही चांद पर बैठ पूरी धरती का चक्कर लगाना।
कहती, तुम मेरे साथ बैठ जाना अकेले मन नहीं लगेगा ना। तुम साथ रहोगे मन लगा रहेगा!
उसे नदियाँ, झील, तालाब बुलाया करते थे। वो उनमें पैर डाले उनसे घंटों बातें करती।
बहता पानी जैसे उसे छू महक उठता जैसे चांद उसे देख और चमक उठता था!
उससे बात करने चिडियों की कतारें लगती। उनका संगीत और मधुर हो जाता उसे सुनकर!

ओस कुछ और ठंडी हो जाती, बर्फ कुछ और सफेद!
वो कुछ और ही थी।
इस दुनिया में ऐसे लोग नहीं होते।
वो इस दुनिया की नहीं थी... परी थी... यू नो!

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