इजहार
“अरे इतनी शाम को कहाँ चले शाश्वत भाई?”
“कहीं नही यार बस घर पे मन ना लग रहा था।”
“अबे सिधे सिधे बोलो ना सौम्या को देखने जा रहे हो। बस इसी वक़्त तो आती है बालकनी में। जब से सोसाइटी मे आयी है। तुम्हारा शाम को घुमना बढ सा गया है।
“नहीं यार ऐसा नही है। तुम भी ना कुछ भी बोलते हो। ” सौम्या की बालकनी की ओर नज़रे घूमाता मैं बोला।
“यार लाख कोशिश कर लो इश्क़ छुपाने की चेहरा किताब हो जाता है।”
“यार तुम तो बचपन से साथ हो अमित। तुम तो जानते हो अच्छे से मुझे। इन सब चिजो मे मुझे कोई दिलचस्पी नही।”
“हाँ जानता हूँ। और ये भी की तू अब मुझसे भी झूठ बोलने लगा है।”
“हाँ यार प्यार तो मै करता हूँ सौम्या से। जिस दिन उसे पेहली बार देखा सोसाइटी पार्क मे उन बच्चों के साथ कसम से पेहली नज़र का प्यार क्या होता है समझ आ गया।”
“अब आया ना लाईन पे। तो मिला की नही उससे बातचीत वातचीत।”
“अरे कहाँ यार।”
“तो जा ना क्या कार्ड का इन्तजार कर रहा है?”
“भाई मै लडकियों से आंखें नही मिला पाता तू बात करने की बात करता है।”
“अरे मजनूँ बिना तैरे गंगा पार नही होती। चल बात कर लेना अभी दिदार कर ले।”
“ही ही ही।” लेक्चर के दौरान जब प्रोफेसर घटिया जोक सुनाता है वैसी ही हसाँ मै।
सौम्या अपने घर के बालकनी मे खडी थी। उसके खुले बाल मानो जैसे उस पूनम की रात को ढकने की कोशिश मे लगे थे। हल्के हल्के हवा के झोकों संग इठलाते उसके बाल जैसे मुझे चिढाने भर को ही हवा मे अठखेलियां कर रहे थे।
“अबे इतनी शिद्दत से ना घूरो ना अभी आ कर तुम्हे खुद हाय प्रपोज कर देगी।”
“तुम्हे तो हर वक़्त मजाक ही सूझता है यार।”
“हां तो तुम सीरियस हो जाओ और कर दो प्रोपोज भाभीजी को।”
“कर तो दे भाई मगर हमे पसंद करेगी क्या?”
“करेगी काहे नही? अरे अच्छे खासे पढे लिखे हो बढ़िया नौकरी है घर परिवार से ठीक ठाक हो और कोई बुरी आदत भी नही है।”
“भाई वो स्वैग नही है हमारे में।”
“अबे स्वैग का अचार डालोगे क्या? जिन्दगी बितानी है तस्वीर नही खिचानी स्वैग चाहीए इनको। जैसे हो वैसे ही रहो समझे।”
“जी सरकार।”
“हाँ अब चलोगे घर या यही बैठने का इरादा है। भाभीजी तो अन्दर चली गई।”
“चलो भाई काम भी बहुत है।”
*अगले दिन*
“देखो शाश्वत भाई अच्छा सा मौका देखकर भाभीजी को दिल की बात बोल दो समझे।”
“हाँ भाई कोशिश करेंगे।”
“चलो मै चला अपने ऑफ़िस।”
“मै भी चला भाई।”
दो तीन दिन यूँ ही बीत गये पर मैने कुछ नही किया। कदम ही नही उठते थे हिम्मत जवाब दे जाती थी।
मगर इश्क़ था कम्बख्त बढ़ता ही जाता था।
हर शाम मै उसकी बालकनी के निचे जाता था मगर जब सामने होती तो जबान को जैसे लकवा मार जाता था। उसी दौरान पता चला की सौम्या की भी आई टी मे जौब लग गई थी। आशंकाए बढी। लगा अब मौका देख कर बोल ही देना चाहीए।
उस रात हुई बात को लगभग हफ्ता भर बीत गया था।
अगले दिन इतवार था।
मै सुबह सुबह तैयार होकर पार्क में जा बैठा। लगभग पैंतालीस मिनट हुए होंगें की मुझे सौम्या पार्क की ओर आती दिखी।
तभी अचानक मेरे मोबाईल जोरों से बज उठा।
“हैलो शाश्वत जी बात कर रहे है क्या?”एक घबराई हुई आवाज आयी।
“जी आप कौन?”
“देखीये अमित का ऐक्सीडेंट हो गया है आप जल्दी आ जाईये।”
“उनका मोबाइल तो लौक्ड़ है पर उनके पर्स मे से आपका कार्ड मिला। जल्दी से सेंट्रल अस्पताल मे आ जाईये।”
मै बद हवाश भागा। बाइक निकाली और सीधा अस्पताल पहुंच गया। वहाँ पता चला की अमित की बाइक को ट्रक ने टक्कर मार दी थी वो अभी औपरेसन थियेटर मे था। पता लगा की उसके ब्रेन मे गहरी चोट थी।
मुझे वहाँ पहुंचे लगभग बीस मिनट हुए होन्गे की मैने देखा सौम्या वहाँ आयी।
“अरे सौम्या जी आप यहाँ?”
“मै पार्क मे आपसे मिलने आ रही थी मगर तभी देखा आप बड़ी तेजी से बाइक लेकर निकले मैने भी स्कूटी निकाली और आपके पीछे आयी।
हुआ क्या है? आप अस्पताल क्यूँ आये?”
“वो अमित का ऐक्सीडेंट…”
“क्या अमित का ऐक्सीडेंट?”
“जी”
वो जा कर कुर्सी पर बैठ गई। मै काफी देर तक इधर उधर घूमता रहा। कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर निकले। उन्होने बताया की अमित खतरे से बाहर है तब जाकर थोड़ा चैन आया।
मैं सौम्या के लिये कौफी लेकर आया।
“अब वो खतरे से बाहर है।”
“जी सुना मैने। भगवान का शुक्र है।”
“आप मुझसे मिलने क्यूँ आ रही थी?”
“आप मुझसे प्यार करते है?”
“जी?”
“ये आपको सुनाई नही दिया या ये मेरा जवाब था?”
“जी करता हूँ पर आपको किसने कहा?”
“अमित ने। कल शाम मेरे घर आया था। उसने बताया की आप मुझसे प्यार करते है। आपको तो हिम्मत ही नही हो रही थी।”
“तो आपका क्या खयाल है।”
“अमित ने तो मुझे जो भी बताया उसके बाद आप काफी मुझे पसंद आने लगे है। मगर फिर भी मै आपके साथ कुछ वक़्त बिताना चाहूंगी।वैसे सच कहूँ तो आप दिल के बहुत साफ लगते है।”
“ही ही ही।” फिर वही प्रोफेसर वाली हसी।
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