पलाश का रंग

 पलाश का रंग अब पहले जैसा नहीं लगता है मुझे। अब मुझे कुछ भी पहले जैसा नहीं लगता है। राजा पुल के नीचे बैठे साइकिल से तुमको स्कूल से लौटते देखने की आस में एकटक बैठने वाला लड़का अब इंतजार कराये जाने पे खीजने लगता है। वैसे इंतजार उसे कभी पसंद भी नहीं था, पर तुम्हारी बात और थी!

मुझे याद है तुम्हारे घर में एक हरश्रिंगार का पेड़ हुआ करता था जिसकी आधी डालियाँ तुम्हारे घर की कील लगी दिवारों से बाहर झांकती थी। मुझे पसंद था हरश्रिंगार, फूल खुद ब खुद सुबह उस पे से झड़ जाया करते थे जैसे प्रेम से भरे इंसान से प्रेम झरता है। तुमसे अलग होना…

तुमसे अलग होना मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी! मुझे सिर्फ तुमसे प्रेम था, या तुम्हारी साइकिल से, या फिर बस उस इन्तजार से जिसने मुझे शायद इंसान बना के रखा था! क्युंकि अब मैं इंसान नहीं हूँ, अब मुझसे इंतजार भी नहीं होता और ना ही अब मैं प्रेम करता हूँ।

बड़े होते जा रहे शहर में बनते ये पुल जाने कितनी नई पनपती इश्क़ की कहानियों को अपने नीचे घटता हुआ देखेंगे! मैं इस बड़े पुल के नीचे कितने आसानी से छुप जाता हूँ, और तुम्हें इसे पार करने में लगने वाला वक़्त कितना सुखद होता है ये बस मैं जानता हूँ और ये पुल जानता है!

बड़े शहर जितनी आसानी से कहानियों को जन्म देते है उनमें होने वाला विस्थापन उन कहानियों को उतनी ही जल्दी खा जाता है, खास तौर पे पुल के नीचे जन्म लेने वाली कहानियों को!

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