यही है प्रेम!

 तुम हो या ना हो मुझे एक शख्स हमेशा तुम्हारे जैसा मिल जाता है… मेरे अंतर ने हर जगह जैसे तुम्हें जज्ब कर लिया हो! कितना संगीन अपराध किया, मैंने तुमसे बिना पुछे… जैसे आईना नहीं पूछता तस्वीर उतारने से पहले मैंने नहीं पुछा तुम्हें खुद में उतारने से पहले।

बस तुम्हारा हो गया जैसे बरसों से इसी के लिये इन्तजार में था। जब आप प्रेम में होते है तो पूरी दुनिया में सबसे सुकून भरा उस शख्स का कन्धा होता है और आप शहर के ऐसे कोने तलाशते है जहाँ आपको आप उसकी गोद में सर रख सो पाये। सन्नाटे, एकान्त, अन्धेरे का सम्मान करना सिखाता है प्रेम…

रवीश ने कहाँ था न आप शहर के हर अनजान कोने सम्मान करने लगते है। उन कोनों में जिन्दगी भर देते है… आप तभी शहर को एक नये सिरे से खोजते है जब प्रेम में होते है। हाँ वही एनडीटीवी वाले… मैं भी तो यही करता हूँ ना। तुम्हारी और मेरी खामोशियों के बीच कही दबी मोहब्बत को ढूंढ़ता हूँ।

हमारे शहर में भी कहाँ है हाथ पकड़ने की जगहेंं मगर फिर भी तुम्हारे हाथों से छुआ जाना दिल चाहता तो है… और फिर इसके लिये जाने कितनी कोशिशें! तुम्हारे साथ आना जाना मेरा स्वार्थ है… जब बीच बीच में तुम ऑटो में जगह बनाती मेरे पास आ जाती हो न बस वही तो स्वार्थ है मेरा!

तुम्हारे बालों का यूँ हवाओं के साथ खेलते हुए मुझे छूने आना…और तुम्हारी खुशबू लेते आना! मेरा तुम्हारे साथ तुम्हारे घर जाने को बोलना और तुम्हारा मुस्कुरा मुझे थपकियाँ लगाना… “बहुत मजाक करते हो तुम! मम्मी से मिलोगे क्या?” “मिल लूँगा। खाना खिलायेंगी न? बहुत भूख लगी है।”

और तुम्हारी हसीं! तुम्हारा हाथ पकड़ने की सोच भी शायद सब देख लेते है। जैसे मेरा चेहरे पर लिखा आ जाता है सब। “तुम ना ऐसे ही मुझे देख मुस्कुराते रहते हो सबको शक तो होगा न!” “तो क्या चाहती हो न देखूँ तुम्हें?” “देखो पर जैसे सबको देखते हो। खास क्यूँ बनाते हो? और मुस्कुराया मत करो।”

“अच्छा अब नहीं करूँगा!” और ये झूठ यूँ ही चलता रहता है। यही है प्रेम और क्या होता है!

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