रूई के फाहे…
वो भाग रहा था, हालांकि ये जानते हुए की भागना हल नहीं होता, फिर भी ये उस वक्त आसान लगता है!भाग जाना सब से दूर, शोर कोलाहल से दूर, रिश्तों पुकारों से दूर, खुद से दूर … भागते भागते हम कही और निकल जाते हैं
मसूरी, वो मसूरी निकल गया। क्यों, ना मालूम!
सफेद चादर से ढ़की पहाड़ियाँ, मखमली हरी घास, रंग बिरंगे पंछी, नीले आसमान पर पेन्टिंग करते सफेद रूई के फाहे और टेढे मेढे रास्ते।
सब जैसे भाग जाने के लिये ही बनाया गया था! इस पूरे भागने के दौरान हम एक चीज छोड़ जाते है, हम भाग किससे रहे है?
वो किससे भाग रहा था? अपने अतीत से, एक शख्स से जो उससे दूर होकर भी हर वक्त उसके साथ होता था पर अब वो उसे बोझ लगने लगा था। अपनी गलतियों से जो उसे इस रास्ते पर लाई थी।
पर क्या भाग जाना आसान होता है?
रास्ते में पड़ने वाली “कशिश चाय स्टौल” उसे वापस वही ले गई जहाँ से वो भाग कर आ रहा था, कशिश…
रास्ते के किनारें लगे गुलमोहर के पेड़ों से गिरे गुलमोहर को चुनती लडकियों ने उसे वापस अपने शहर में गुलमोहर चुनती “उसके” पास भेज दिया जो अब उसके दिल के किन्ही दूर के गलियारों में सिमट गई थी…
पर ये सिमटन बड़ी अजीब होती है, जरा सी दरार से ये पूरी बाहर निकल जाती है! भागना आसान नहीं होता…
पेड़ की ड़ाल पर अकेले बैठे हुए एक छोटे पंछी को उसकी माँ ने धक्का दे दिया। वो बेचारा भी भाग जाना चाहता था, वापस उसी डाल पर, वही चिपके रहना चाहता था। पर ये जीवन है, यहाँ धक्के मिलते हैं!
पहाड़ों के बीच सिमट रहा ये तालाब भी भाग जाना चाहता था, दूर इंसानी अतिक्रमण से, जैसे वो भाग रहा था अपनी यादों के अतिक्रमण से!
भाग जाना फिर भी आसान है, पर खो जाना?
प्रेम का विपरीत क्या होता है? घृणा? नहीं। उदासीनता!
पर क्या प्रेम करने वाला उदासीन रह पायेगा?एक कराह, एक पुकार उसे वापस उसी खाई में फेंक देगी जहाँ से वो उठ कर आया…
प्रेम कभी पूर्ण उदासीनता में परिवर्तित नहीं होगा, कम से कम मेरा तो नहीं!
मसूरी के होटल के कमरे की बालकनी अकेले इंसान को अतीत में भेज देती है! वो भागता है और पीछे चला जाता है।
तुम भी… भाग जाओ…
दुनिया से, खुद से और सबसे पहले प्रेम से…
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