साये
ये तो तय है की मोहब्बत एक नज़र में नहीं होती मगर इसको होने को एक अरसा चाहिये ऐसा भी नहीं है। वक़्त का पता नहीं चलता और इंसान दुसरे इंसान से इतना जुड़ जाता है की जैसे जन्मों से जानता हो उसको।
हमारा किस्सा कुछ ऐसा ही है। “पहली मोहब्बत” और वो भी तब जब आप लड़की से भागते रहे हो।क्लास के अच्छे स्टूडेंट थे तो मास्टर साहब पिताजी और पुरा समाज अलग ही जोर लगाये रहता था और ये सब सुन हम खूब चौड़ में घुमा करते। वो उम्र थी की प्यार मोहब्बत से कोई सरोकार भी न था। दोस्त थे काफी थे।
कब ये सब अकड़ बन गया पता ही ना चला। क्लास में कोई लड़की अगर बात करना भी चाहती तो हमारा लहजा रोक लेता। हालांकी मन में हमारे कभी रहा नहीं कुछ पर वो जो बचपने में आदत लग जाती है वो आसानी से नहीं जाती। अब तो हमारे और लडकियों के बीच कोई इंटरैक्शन ही नहीं था और अब उम्र ऐसी आ चुकी थी की ऐसा करते अच्छा नहीं लगता था या यूँ कहें तो क्या करना है पता ही न था।
और समाज इतना अच्छा है हमारा की इसमें हमारा पुरा सहयोग करता है। खैर ऐसा नहीं हुआ की हमें कोई अच्छी नहीं लगी। प्यार तो नहीं हुआ पर वो क्रश बोलते है ना आजकल। वो अलग बात की बुरी तरह भाई बनाये गये और पूरी मित्र मंडली में आज भी इसके लिये तारिफ के पात्र है।
खैर अच्छा वक़्त भी आता है।
हमें मोहब्बत भी हुई। अब जिस इंसान ने कभी भावनाएँ जतानी ना सिखी हो, बचपन से अकेले ही रहा हो उसके लिये ये दौर बड़ा अजीब होता है। उसे खुद पता नहीं होता की उसके साथ क्या हो रहा है।
घर के इकलौते लड़के होने की वजह से इन सब मामलों में और पीछे ही रहे।
मगर अब क्या करे?
मिट्टी कितनी भी कठोर हो नदी का बहाव उसको काट ही देता है। हमारे साथ भी यही हुआ। सच बोले तो पहले पहल तो ऐसा लगा जैसे सारी भावनात्मकता खत्म हो गई है। मगर तुफान आने के पहले की शांती…
अचानक से जैसे सब बदल गया। पूरी दुनिया से लड़ के चलने वाला अब डरने लगा था। किसी की चिंता न करने वाले को अब चिंता होने लगी थी।
लिखना तो पहले से जैसे तैसे चल रहा था मगर अब जैसे सारी कहानियाँ कविताएँ जीवन्त होने लगी थी। अब उनमें होने वाला जिक्र जीया जा रहा था।
मगर मोहब्बत करने से उसको बयां करना हमेशा मुश्किल रहा है। और हमें तो फिर बोलना आता ही नहीं था।
अजीब मुसीबत थी और अजीब डर भी था। बोलने में भी डर था और ना बोलने में भी। और फिर लड़को में एक जन्मजात इनसेक्यूरिटी होती है और उनको इस बात का डर हर वक़्त लगा रहता है।
खैर हिम्मत कर हमनें बोल ही दिया और अधर में लटकाये भी गये। मतलब हाँ है, मुझे केयर है, तुम पसंद हो, अच्छे हो, तुम जैसा लड़का नहीं मिलता मगर इतनी जल्दी कोई नाम नहीं देना हमको इस रिश्ते को। खैर हमें भी सब मंजूर…
आते जाते उसके खयालों ने यूँ मुझे ढ़क रखा था की और कुछ सूझता ही न था।
हर शाम वो मुझसे जब दूर जाती तो उसकी ओर देखते देखते जैसे मैं शाम को रात कर देता। अब तो शफ़क को भी उससे जलन होने लगी होगी।
जो शख्स एकटक बैठ शाम को निहारा करता था जिसके लिये उसकी कविताओं की एकमात्र संगीनी ये शाम थी वो किसी और के लिये कविताएँ लिख रहा था।
शाम भी जैसे ये सब देख उदास हो जाती…
उसी का जिक्र उसी से करना भी क्या सुकून है।
जैसे कई दिनों की झुलसा देने वाली गर्मी के बाद पत्तों पे पड़ी बूँद। अब ये कहना मेरे लिये मुश्किल नहीं था की मैंने मोहब्बत कर ली थी। पेहली बार इतने सारे ख्याल, इतनी उम्मीदें, इतनी सारी बातें और इतनी भावनाएँ।
अब दोबारा सपनें आने लगे थे और वो सब जो मैं सामने ना कह पाता वहाँ कह देता। वहाँ कहना मुश्किल नहीं लगता था।
सबसे खुबसूरत बात ये थी की वो शख्स मेरे दिल की सारी बातेंं अब बिना कहे समझ जाता था मगर फिर भी मुझसे सुनना चाहता था। उसका मुझे अपनी बातें कहने के लिये कहना जैसे भक्त के लिये स्वयं भगवान द्वारा गुरु मंत्र दिया जाना।
मैं महसूस कर सकता था… उसकी मोहब्बत!
दो लोग जब धुप में साथ चल रहे हो तो एक वक़्त आता है जब साये आपस में मिल जाते है। उस वक़्त जैसे कुछ अदला बदली हो जाती है आप अब दूर हो सकते है अलग नहीं!
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