विंटेज
वैसे किस्सगोई का कोई खास फन था नहीं उसे पर जब प्रेमिका शांत और कम बोलने वाली तो प्रेमी को बहुत जतन करने पड़ते है।
किस्सा कुछ पुराना है पर मजेदार है!
बात तब की है जब घरों में टेलिफोन हुआ करते थे। उस छोटे से शहर के किनारे पे बसे उस मोहल्ले में बमुश्किल आठ दस घरों में होगा।
धीरे धीरे अब सारे घरों में पहुँच रहा था ये दुरी बढ़ाने वाला यंत्र! हाँ बढ़ाने वाला ही।
खैर मुझे अभी टेलिफोन की बात नहीं करनी।
बात तो मुझे उनकी करनी है जो उस जमाने में भी मोहब्बत को कितनी खुबसूरती से निभाते थे जब आठों पहर नज़र रखने के साधन नहीं थे।
ऑनलाइन नहीं तो रिश्ता खतम।
इन सब बातों की मुखलाफत करते मोहब्बत करने वाले क्या खुबसूरत मोहब्बत किया करते थे! पाव-डेढ़ पाव खून से लिख कर भी जो आज कल के लड़के मोहब्बत निभा नहीं पाते वो उस वक़्त आँखों के इशारे भर से निभा दी जाती थी!
ऐसे ही कुछ थे योगेश और भावना! दोनों का कुछ दस घर के फासलों पे था!
योगेश ने पहले पेहल उसे साइकिल से कॉलेज जाते देखा था। स्कूल तक तो लड़कियाँ अलग ही रहती थी। दोस्ती और प्यार के बड़ा खुबसूरत पायदान बने थे। सब अपने वक़्त से होता था।
हाँ कुछ दोस्तियाँ मोहब्बत बन जाया करती थी वो बात और है!
नीला सूट और सफेद सलवार पहने भावना जब कॉलेज के लिये निकलती तो योगेश की साइकिल धीरे धीरे हवा के थपेडों को चूमती आगे बढ़ते जाती।
वो हर बारीकी को अपने आँखों में उतार लेता। आज अलज़ेब्रा की किताब रखी है अच्छा! मैथ्स से है। उस वक़्त लड़कियाँ मैथ्स कम ही पढ़ती थी। पर मैथ्स तो हमें जमता नहीं हम तो आर्ट्स वाले है! प्योर हिन्दी लिटरेचर लवर!
कोई बात नहीं इश्क़ सब्जेक्ट देख के थोड़े न होगा। केमेस्ट्री जमनी चाहिये! कभी दो चोटी तो कभी एक पर कभी खुले बाल नहीं होते थे।
एक दिन रास्ते में उसके साइकिल की चैन खराब हुई तो योगेश भईया कैसे रुकते। आगे साइकिल लगा आये और बोले, “लाइये मैं कर देता हूँ आपके हाथ गंदे हो जायेंगे!”
वो बिना कुछ बोले पीछे हट गई। भईया का दिल तो जैसे हिलोरें ले रहा था!
फिर उसने पीछे से कहा, “आप रोज इस रास्ते से कहाँ जाते है?”
धक्क! अब क्या बोले?
“क क क …. कॉलेज!”
“गर्ल्स कॉलेज?”
“नहीं दीनदयाल कॉलेज।”
“पर ये तो उल्टा रास्ता है।” और उसकी हल्की सी मुस्कान छिप न सकी।
“जी चेन बन गई।”
“ओह्ह शुक्रिया।”
और वो जाने लगी। फिर पीछे मुड़कर बोली, “ऐसे रोज रोज पीछे आना ठीक नहीं।”
इस बार उसके चेहरे पे दौड़ती हसी साफ दिखाई दे रही थी!
इतने करीब से उसे देख भईया संभल ना पाये। अब तो मोहब्बत हो ही गई थी!
अब उनकी साइकिल पीछे नहीं साथ रहा करती थी।
उसको छू कर आती हवा जब चेहरे से टकराती तो आँखें बंद हो जाया करती थी!
बीस मिनट का वो रास्ता जैसे बीस सैकेण्ड में बीत जाता जैसे।
लडकियाँ अपनी मोहब्बत इतनी आसानी से नहीं सामने आने देती। टू जी इंटरनेट की तरह डाउनलोड होता है इश्क़! धीरे धीरे!
भावना भी कुछ ऐसी ही थी।
ये भी अजीब था की दोनों कभी कुछ खास बात चीत नहीं करते थे।
फिर छुट्टियाँ आ गई। अब वो मिलना भी मुमकिन नहीं था। सैकड़ों पाबन्दियाँ थी!
योगेश ने दुसरा तरीका निकाला। वैसे भी आमने सामने दोनों बोल नहीं पाते क्यूँ ना खत लिखा जाये!
अगली सुबह वो जब खत लेकर निकला तो उसे खत पहुँचाने का तरीका ना सुझा।
फिर उसने अखबार वाले से दोस्ती की! अब अखबार पहले योगेश के हाथ में जाते फिर भावना के आंगन में!
अखबार के बीच दुसरे पन्ने में दबा होता था उसकी प्रेम!
खत भी क्या खुबसूरत चीज है!
सारे फसाने लिखे जाने लगे! पेहली दफा इजहार ए मोहब्बत भी खत से ही हुआ।
मगर मुश्किल ये थी की जवाब नहीं आते थे!
हरसिंगार के पेड़ के नीचे पड़े अखबार को उठाते वो खत को निकाल कुचले फूलों के बजाय उसके खत को लिखते वक़्त स्याही से सने उसके हाथ जो इस खत पे लगे थे उनकी सुगंध लेती थी!
उसका खत को चूम लेना ही इजहार था उसका!
एक दिन अखबार लाने पिताजी चले गये! खत देख उनका जो पारा चढ़ा तो गली भर के लौंड़ो को गालियाँ देने लगे!
सेकेंड भी ना लगा और खत टुकड़े टुकड़े हो गया!
उस रात बिखरे खत के टुकड़ो को समेटते और अपने आंसुओं को संभालते पेहली बार उसे अपनी मोहब्बत का एहसास हुआ!
अगली सुबह जब योगेश वहाँ आया तो पुराने अखबार में एक खत दरवाजे के बाहर रखा था!
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