प्रेम की नाव!

 तालाब के किनारे बैठ किताब पकड़े कोई प्रेम पढ़ रहा था, तो दूसरे हिस्से से उसे निहारते कोई प्रेम गढ़ रहा था।प्रेम का पढ़ा जाना और गढ़ा जाना समानांतर क्रिया हो गई। कोई पन्नों में प्रेम पढ़ रहा था, तो कोई उन पढ़ती आँखों से प्रेम गढ़ रहा था।

तालाब में उसकी कांपती परछाई बता रही थी की वो प्रेम गढ़ रहा था। प्रेम करने वाले का हृदय तेज धड़कने लगता है।

पर कुछ गढ़ने के लिये पहले उस चीज को अपनाना होता है। यहाँ तो जिससे प्रेम की डोर बाँधनी है उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।

देर तलक बैठ प्रेम को प्रेम पढ़ते निहारना भी एक तपस्या ही है। आप होते उसके पास ही है पर दूर होते है।कैसी परिस्थिती है!

इन सब के दौरान सोच विचार जारी रहती है, प्रेम जारी रहता है और डोर बाँधने की इच्छा भी!

पर किताबों के सफेद पन्नों पे काली काली उन बेजान शब्दों के प्रेम को हम जितनी आसानी से समझ जाते हैं क्या सामने वाले के…खैर ना समझे, प्रेम खतम थोड़े न हो जायेगा!

इस हिस्से में एक कॉपी थी, इसपे प्रेम लिखा जा सकता था सो लिखा गया। एक नाव बना कर प्रेम से प्रेम को प्रेम तक प्रेसित किया गया।

हिमाकत थी ये मगर प्रेम ढ़ीठ बना देता है, इंसान गलतियाँ करता है, रोता है, फिर गलतियाँ करता है, बिलखता है, पर कभी उस इंसान से हारता नहीं!

विचित्र चक्र है…

खैर नाव तो कभी प्रेम तक पहुँची ही नहीं, हाँ बेशक वो प्रेम ले गई और तालाब का एक हिस्सा प्रेम विहीन हो गया।एक हिस्सा प्रेम पढ़ने में खोया रहा, और एक हिस्से में रह गया प्रेम, विशुद्ध प्रेम जो अब किसी के काम आयेगा शायद…शायद!

ओह्ह, प्रेम भीग कर डूब गया…

गुलमोहर से एक फूल गिरा धप्प, और बस प्रेम ने दम तोड़ दिया!

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