ऑनलाइन-इश्क़

 आज फिर कही से उसका जिक्र निकल आया।तब मै फिर से उस पुरे फ्लैशबैक मे चला गया जब मैने उसे दोबारा पाया था।

***

बात कॉलेज के फाइनल इयर्स की है। अब इस सोशल मीडिया के जमाने मे किसी को भुलाना भी आसान नहीं। जाने कब कहाँ आपके नजरो के सामने उनका जिक्र आ जायेगा और आपको फिर से उन्हीं यादोँ मे धकेल दिया जायेगा जिनसे आप लाख कोशिशे कर के निकले है। अक्सर ये उन पुराने जख्मों को कुरेद कर फिर से हरा कर देते है जिनकी कोई दवा भी नही की जा सकती।

हमे तो 2-3 साल पहले तक ये सब पता भी नही था की ये सोशल मिडिया किस चिड़िया का नाम है। कुछ दोस्त थे जिनके साथ वक़्त कट जाता था। लड़कियों से बात करने की हिम्मत ना थी हममें। फिर ये सोशल मिडिया हमारे जीवन मे आया। तब जाकर हमे पता चला की हम कितने खुलकर किसी से बात कर सकते है। मगर मुहँ पर तो हम आज भी कुछ नही बोल पाते।

इस सोशल मीडिया के जमाने मे प्यार दोस्ती सब खेल से बन गये है मगर अगर सच मे किसी के लिए तुम्हारे दिल मे जज्बात आते है और हर दुसरे पल तुम्हारे दिल मे उस किसी का खयाल आता है तो समझ लेना की इस सोशल मीडिया ने अभी भी तुम्हारे अन्दर के इन्सान को खत्म नही किया है।

खैर हो जाता है इश्क़ इस ऑनलाइन के जमाने मे भी। भले ही दरमियांँ दूरियाँ हो पर पुरानी दोस्ती कब मोहब्बत मे बदल जाती है पता ही नही चलता। कभी जिनसे बात करने की हिम्मत ना होती थी ये आज उनसे भी मिलवा देता है और हम भी बिना झिझके बात कर लेते है। वर्ना हम तो आज भी किसी लड़की से बात ना किये होते।

हमने नया नया ही कदम रखा था इस ऑनलाइन की दुनिया मे की हमे वो फिर से मिली। सचमे दुनिया बहुत छोटी हो गयी है ऑनलाइन होकर। एसे अचानक उसे देखकर हमे विश्वास ही नही हुआ। अरे हमारी किस्मत इतनी भी अच्छी कहाँ है? मगर फिर भी जो दिख रहा था उसे कैसे नकार देता। एकबारगी तो लगा की सपना है शायद, मगर फिर यकिन हो ही आया। पसंद तो उसे हम स्कूल के दिनो से ही करते थे पर कभी भी इस जुबान ने साथ नही दिया। शायद उसे एहसास रहा हो या शायद नही मै नही जानता मगर मै तो उसे दिल दे बैठा था। उसकी वो मुस्कान,चुलबुली हरकते,हमसे झगड़ने की कोशिश करना सब खीच ले जाता था हमे उसकी ओर। पर हमारी झिझक थी की हमारा पीछा नही छोड़ती थी, और प्यार था की हमारा।
लेकिन स्कूल के दिन खत्म हो गये पर हमारी झिझक नहीं। और वो आज तक बरकरार है।

मगर फिर हमने सोचा यहा कोशिश करके देखते है क्या पता कुछ हो जाये। हमने पहली बार अपने कदम(बेशक ऑनलाइन ही) किसी लड़की की ओर बढाए। मगर हम जैसे इंट्रोवर्ट्स के लिए हाल ए दिल का इजहार करना किसी चुनौती से कम नही। यहाँ बात करने मे जुबान लड़खड़ा जाती है फिर मोहब्बत कैसे बयान हो। खैर हमने हिम्मत की और उसे एक मैसेज भेजा। और पुछा भी क्या,”तुम ‘वही’ हो ना?” जब तक उसने मेरे मैसेज का जवाब नही दिया था मै हर पल मुड़ मुड़ कर मोबाइल को देखता रहता था। “हा हा वही हूँ मै जिससे तुम रोज लड़ा करते थे।”ये जवाब देखकर तो मानो मेरा मन सातवें आसमान पर पहुंच गया। अरे भाई खुशी की बात भी थी। आखिर वो मेरी जिन्दगी मे लौट जो आयी थी। मन मे लड्डू फूटना क्या होता है ये उस दिन पता चला मुझे। वो समय था जब हम मोबाइल को छोड़ते ही नही थे। जाने कब कुछ आ जाये। धीरे धीरे पुरानी यादों को फिर से दोहराते हुए हमने एक दुसरे के बारे मे कई नयी चीजे जानी।

साँस लेने और खाने के बाद जीने के लिए तीसरी सबसे जरूरी चिज थी सोना। अब तो वो भी छुट गया। रात रात भर जागने लगे थे हम। उसका एक मैसेज सारी नींद उड़ा देता था। खैर बाते दिल को सुकून बहुत पहुंचाती थी। उन दिनो हर पल हर वक़्त बस यही खयाल रहता था की अगली बार बात कब होगी। हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचता रहता था ताकी उससे बात करते वक़्त ऐसा ना हो की शब्द कम पैड जाये। हर वक़्त दिमाग मे उससे की गयी बातें घूमती रहती थी। यूँ तो बातें होती नहीं है मेरे पास पर उससे बात करते वक़्त जाने कैसे मै इतना सब कुछ सोच लेता था।

देखते देखते मुलाकातो का सिलसिला शुरु हुआ और स्कूल की दोस्ती कब बेइन्तहा मोहब्बत मे तब्दील हो गयी पता ही नहीं चला।अब तो उसकी नज़र से दूर रहना भी हमे गवारा ना था। बेशक इजहार-ए-मोहब्बत मुश्किल है हम जैसे इंट्रोवेर्ट्स के लिए मगर मोहब्बत मे सिद्दत हो तो कोई काम मुश्किल नही होता। फिर उसे हमराही बनाये बिना हमारी जिन्दगी पूरी भी तो नहीं होनी थी। फिर भी सोच लेना एक बात है प्रोपोज करना दुसरी। हमारी हालत वैसे ही खराब थी उस दिन। कई दिनो के बाद हमने मंदिर के दर्शन किये थे उस दिन। वरना हमारी इबादत तो उस हुस्न के दिदार मे ही हो जाती थी। बड़ी हिम्मत करके हम उससे मिलने जा रहे थे उस दिन। अभी हम मन्दिर से निकल कर गाड़ी पे बैठे ही थे की हमारी फ़ोन की घंटी जोरो से बज उठी। एकबारगी तो हमे लगा की उसी का फ़ोन होगा तो हमने जल्दी से फ़ोन उठाया।

कोई अन्जाना नम्बर था तो हम थोड़े हिचके मगर फिर फ़ोन उठा लिया। उधर से आवाज़ आयी,”जी आप सुधीर बोल रहे है क्या?”
“जी हा कहिये।”
“देखीये रागिनी जी का ऐक्सीडेंट हो गया है, जब उन्हे अस्पताल लाया गया तो उनकी मुँह पे बस आपका ही नाम था। उनकी मोबाइल मे सबसे पहले आपका ही नम्बर मिला तो आपको फ़ोन किया सुधीर जी जल्दी से नेशनल हेराल्ड अस्पताल आ जाईये उन्हे आपकी जरुरत है।”उसने कहाँ और फ़ोन रख दिया।

मेरे पैरो तले से जमीन खिसक चुकी थी। मै ये तय नही कर पा रहा था की मै क्या करू। मेरा दिमाग सुन्न पड़ने लगा था। मुझसे गाड़ी भी स्टार्ट नही हो रही थी। मै पसीने से तर-बतर हो चुका था। किसी तरह मैने गाड़ी स्टार्ट की और अस्पताल की ओर चल पड़ा। मै अस्पताल पहुँचा और गिरता पड़ता हुआ रिसेप्सन की ओर भागा। मेरे कदम लड़खड़ा रहे थे और साँस बुरी तरह फूल रही थी। जैसे तैसे मै रिसेप्सन पर पहुँचा और पुछा,”क्या यहाँ रागिनी नाम की कोई लड़की भर्ती हुई है? ऐक्सीडेंट का केस है।”
“जी आगे जाकर लेफ्ट चौथा कमरा।”
मै दौडता हुआ गया। वो ओटी था। औपरेशन थियेटर। बाहर एक नर्स थी हमने उससे पुछा,”क्या हुआ है उसे?”
“सर मे गहरी चोट है। कोमा मे है बेचारी।”
मै धम्म से बेहोश होकर गिर पड़ा। जब मै उठा तो पता चला की ब्लड प्रेशर अचानक से कम हो गया था और डर का जबर्दस्त झटका लगा इसलिए बेहोशी आ गयी। मै करीब दो घन्टे बेहोश रहा था। मैने नर्स से पुछा क्या उसे होश आया।
“देखीये कोमा का केस है ये। इतनी जल्दी कुछ नही होता। दो दिन लग सकते है दो महिने या दो साल भी।”
मै तो टुट सा गया बिलकुल। जीने की बस एक आस थी की वो उठेगी और कहेगी चले शादी करने।

***

आज पुरे आठ महिने हो चुके है उसे कोमा मे।


Comments

Popular posts from this blog

पोस्ट बॉक्स

एक डरावनी कहानी

तस्वीर और कविताएँ