...♡

किताब अधखुली... पन्ने फड़फड़ाते... धुंधलके से झांकता चांद और खूब सारी बातें...
बस ऐसी ही होती थी मुलाकातें उससे!
किसी शाम जो मैं सितारों के निकलने के साथ ना पहुँचता तो मेरी जम के क्लास ली जाती।
"बताओ कहाँ रह गये थे? अब आ रहे हो, जब उल्लू बोलने लगे। और हम यहाँ इन्तजार में दिल पकडे बैठे हैं।"

इस प्रेम भरे झिड़क के बाद हमें जो मिलता वो शायद किसी को ना मिले।
चांद को निहारते उसकी आलते लगे पैरों को झिलमिल चमकते पानी में थिरकते देखना तो सब चाहते थे पर वो मेरे हिस्से में आई...
थोड़ी सी देरी पे बेचैन हो जाने वाली वो जब कहानियाँ सुनाने लगती तो बस खो जाती! फिर ना उसे वक्त की सुध रहती ना होशो-हवास।

मुझे कहानियाँ सुनाना उसकी जिन्दगी का सबसे पसंदीदा हिस्सा था!
वो प्रेम सिखाती थी अपनी कहानियों में...
प्रेम, जो शांती लाता है... जो बेचैनी पैदा करता है!
उस रौशनी में उसकी पायल चमकती थी। उसकी हथेली में बनी लकीरें मुझे चिढ़ाती... मैं सोचता नदी के पाट कहाँ मिलते हैं!♡
इन्हीं सब सोच में मैं खो जाया करता था। पानी अपने सतह पे अजीब सी तस्वीरें बनाता और मैं सपनों का महल!
हाफ़ी ने क्या खूब कहा है,

मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नज़र अगर पड़ती
मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पर दिल बन जाता था!

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